इज़रायल की बर्बरता

प्रकाश के रे बरगद के संपादक हैं.

फ़लस्तीन के ग़ाज़ा इलाक़े की ओर राहत सामग्री ले जा रहे जहाजों पर सोमवार सुबह इज़रायली नौसेना के हमले में 9 कार्यकर्ताओं की मौत की ख़बर ने दुनिया को हिला दिया है. इस हमले में 60 से अधिक लोग घायल हुए हैं और जहाजों को इज़रायल ने कब्ज़े में ले लिया है. 400 से अधिक कार्यकर्ता इज़रायली हिरासत में हैं और उनसे कोई संपर्क अभी तक नहीं हो पा रहा है. इज़रायल द्वारा ग़ाज़ा की नाकेबंदी के विरोध में 6 जहाजों का एक काफ़िला लगभग 10 ,000 टन सामान ले कर ग़ाज़ा की ओर बढ़ रहा था जब यह हमला हुआ. ‘फ्रीडम फ़्लोटिला’ नामक इस काफ़िले में 700 से अधिक फ़लस्तीन-समर्थक कार्यकर्ता हैं जिनमें यूरोप सहित दुनिया भर से निर्वाचित जनप्रतिनिधि, पूर्व राजनयिक, पत्रकार, राजनीतिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता और नोबेल पुरस्कार विजेता शामिल हैं. इज़रायल ने 2006 से जारी ग़ाज़ा की नाकेबंदी को 2009 की जनवरी में समाप्त हुए हवाई हमलों के बाद सख्त कर दिया है. इन हमलों में करीब 1400 लोग मारे गए थे और बड़ी संख्या में बेघरबार हुए थे. इस नाकेबंदी के कारण ग़ाज़ा की आबादी राहत सामग्री पर ही निर्भर है.

अंतर्राष्ट्रीय समुद्र में लगभग ६५ किलोमीटर अंदर हुए इस हमले का बचाव कर पाना इज़रायल के लिये आसान नहीं होगा. उसकी मुश्किल इस बात से भी बढ़ जाती है कि इस काफ़िले में 30 से अधिक देशों के नागरिक शामिल हैं और इज़रायल ने किसी भी अंतर्राष्ट्रीय कानून का पालन नहीं किया है. मंगलवार को बुलाई गयी सुरक्षा परिषद् की आपात बैठक में इस हमले की घोर निंदा की गयी और इज़रायल को तुरंत ग़ाज़ा में राहत सामग्री जाने देने को कहा गया. बैठक में इज़रायली प्रतिनिधि ने हमले को जायज़ ठहराते हुए कहा कि ग़ाज़ा में किसी तरह का कोई मानवीय संकट नहीं है. इज़रायल के सबसे करीबी दोस्त अमरीका ने घटना पर चिंता तो जताई लेकिन उसके प्रतिनिधि ने कार्यकर्ताओं की आलोचना करता हुए कहा कि ग़ाज़ा में मदद पहुँचने का यह ‘सही और जिम्मेदारी भरा’ तरीका नहीं है. मंगलवार को ही बराक ओबामा से इज़रायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू कि मुलाकात होनी थी. ओबामा के राष्ट्रपति बनने और मिस्र में जाकर अरब के साथ नए संबंधों की बात कहने के बाद उम्मीद बंधी थी कि फलस्तीन-इज़रायल समस्या का कारगर हाल निकल सकेगा. लेकिन इस हमले के बाद अमरीकी प्रतिक्रिया ने अरब सहित पूरी दुनिया को निराश किया है.

उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के गोल्डस्टोन आयोग ने ग़ाज़ा की नाकेबंदी को संभावित युद्ध अपराध बताया है. इस नाकेबंदी को राहत सामग्री ले जा रहे कार्यकर्ताओं की हत्या कर बरक़रार रखने की इज़रायली नीति उसके और उसके सहयोगी देशों के लिये बड़े सवाल ले कर आयी है. दुनिया भर में जिस तरह से इस हमले का विरोध हो रहा है, अमरीका सहित उन चंद देशों को इज़रायल को अबतक दिए गए अपने अंध-समर्थन पर पुनर्विचार करना ही होगा. यूरोपीय संघ ने निंदा करते हुए घटना की समयबद्ध जाँच की मांग की है. कुछ समय पूर्व ही यूरोप आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन में इज़रायल की सदस्यता का समर्थन कर रहा था. तुर्की ने तो इज़रायल से अपने राजनयिक सम्बन्ध ही तोड़ने की घोषणा कर दी है. यूनान ने प्रस्तावित वायु सैनिक युद्धाभ्यास को रद्द कर दिया है. संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की-मून ने घटना की निंदा की है और जांच की मांग की है.

MV Mavi Marmara/ Freedom Flotilla

हालाँकि इस हमले ने ग़ाज़ा की नाकेबंदी और फलस्तीन की आज़ादी के सवाल को एक बार फिर दुनिया के सामने रख दिया है, लेकिन यह चिंता भी स्वाभाविक है कि पिछली घटनाओं की तरह यह मामला भी निंदा और दुःख प्रकट करने तक ही सीमित रह जायेगा. हमें यह समझना होगा कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, ख़ासकर अमरीका, यूरोप, चीन आदि की चुप्पी ने ही मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को नाकेबंदी तोड़ते हुए ग़ाज़ा पहुँचने की कोशिश के लिये मजबूर किया है. दिलचस्प बात है कि इज़रायल ने राहत सामग्री ले जा रहे लोगों को हमास के जेहादी दोस्त की संज्ञा दी है. इज़रायल की सबसे बड़ी बेचैनी है कि कहीं उसके ख़िलाफ़ भी वैसा ही व्यापक नागरिक विरोध का वातावरण दुनिया में न बन जाये जैसा कि रंगभेदी दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध बना था. हालाँकि उसकी नीति हमेशा यही रही है कि ‘इज़रायल वही करता है जो उसे करना चाहिए, और दुनिया जो कहना चाहे, कहती रहे’. यह हमला उसके इसी दर्शन का परिचायक है. इज़रायली करवाई ने मध्य-पूर्व में परमाणु अप्रसार की मौजूदा कोशिशों पर भी प्रश्न-चिन्ह लगा दिया है. एक डर यह भी है कि इस घटना की आड़ लेकर अल-क़ायदा जैसे आतंकी संगठन अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश करेंगे. मध्य एशिया और मध्य-पूर्व एशिया में ईरान के परमाणु कार्यक्रम में हथियार निर्माण को शामिल करने के लिये भी एक माहौल बनने की पूरी सम्भावना है. यदि ऐसा होता है तो शांति की तमाम संभावनाओं का पटाक्षेप हो जायेगा. आनेवाले कुछ समय में अरब के साथ इज़रायल के सैन्य टकराव की सम्भावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है. आज मिस्र द्वारा ग़ाज़ा से लगी अपनी सीमा खोलने का निर्णय इसकी तरफ संकेत करता है. मिस्र की यह पहल ग़ाज़ा के निवासियों को राहत सामग्री और चिकित्सा की मदद देने के लिये अत्यंत ज़रूरी है और इसका स्वागत किया जा रहा है. लेकिन इज़रायली सरकार इसे स्वीकार करेगी, इसकी सम्भावना कतई नहीं है और यहीं से उस क्षेत्र के भविष्य का एक नया अध्याय शुरू होता है. फिलहाल दुनिया की नज़र इस घटनाक्रम के साथ-साथ बराक ओबामा की ठोस प्रतिक्रिया पर टिकी है.

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