बिहारी मध्यवर्ग ज़रा सोचे/ प्रकाश के रे

‘अपनी आलोचना भी ज़रुरी है’

प्रकाश के रेप्रकाश कहते हैं कि बिहार के लोग जब शहरों में आते हैं तो अपनी संस्कृति भूल जाते हैं.

बिहार विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र हम उन लोगों के अनुभव आपसे साझा कर रहे हैं जो बिहार से बाहर रह रहे हैं. उन्होंने बिहारी होने के कारण क्या देखा, सोचा और जाना. इसी शंखला में प्रकाश के रे के अनुभव जो इस समय छात्र हैं. वो इससे पहले मीडिया में काम कर चुके हैं और स्वतंत्र रुप से फ़िल्में भी बनाते हैं.

मैं दिल्ली में पिछले 18 सालों से हूँ और विश्वविद्यालयों और मीडिया से जुड़ा रहा हूँ. अभी फिर से पढ़ रहा हूं. विश्वविद्यालय में किसी ने बदतमीजी तो नहीं कि बल्कि बिहार का था तो सब सोचते थे कि राजनीतिक रुप से अधिक जागरुक होऊंगा.

आगे चलकर राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता के तौर पर भी दिल्ली में बसे बिहारियों के विभिन्न वर्गों से संपर्क रहा है. इस अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि दिल्ली में रहनेवाला उच्च मध्यवर्गीय और मध्य वर्गीय बिहारी बिहार को लेकर पूरी तरह उदासीन है या उसे ठीक से यह समझ नहीं कि वह बिहार के साथ कैसे जुड़े.

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कॉलेज के दिनों में जब अपने कई सीनियरों के (जो आईएएस आईपीएस या अधिकारी बन गए थे) घर जाता था तो भी बिहार से जुड़ा होने का कोई अंश नहीं देखता था. असल में हम बिहारी बिहार से बाहर आने के बाद वहां से जुड़ना चाहते भी नहीं हैं.

महीने में फेसबुक पर चार बार ठेकुआ और तीन बार बिदेसिया लिख देना भर जुड़ना नहीं होता. ब्लॉग पर दादा-नाना के किस्से या गाँव के आम की तस्वीर भर लगा देने से बिहार-प्रेम सार्थक नहीं हो जाता. भोजपुरी गीतों की कितनी सीडी किसके पास है? भिखारी ठाकुर के बारे में हम कितना जानते हैं? छठ-पूजा के सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व पर कब हमने गंभीर बातचीत की हो? विद्यापति के गीत गाने वाले कौन-कौन गायक हैं?

किसी विद्वान ने कहा है कि नॉस्टेलजिया से मुक्ति के लिये इतिहास का अध्ययन करना चाहिए. मुझे बताया जाये कि किस बिहारी पत्रकार-लेखक ने बिहार की राजनीति का ऐतिहासिक विश्लेषण किया है. मुझे बताया जाये कि किस बिहारी ब्लॉगर ने अपने गाँव में बूथ लूटने की कहानी बताई हो जिसमें उसका कोई घर-परिवारवाला शामिल रहा हो.

अगर आपका कोई दोस्त जो अफ़सर हो तो उससे जानने की कोशिश करें कि उसके घरवालों ने कितनी सरकारी ज़मीन हथियाई है. किसी ने फ़ेसबुक पर लिखा बंद्योपाध्याय समिति के समर्थन में? दोष देना आसान है. कभी नेतृत्व को कभी जाति को कभी राजनीति को लेकिन आत्म चिंतन या अपनी आलोचना बिहारी भी नहीं करते जिसमें मैं भी शामिल हूं.

ख़ैर छोडिये, ये तो बड़ी बातें हैं. बदलने में बड़ी दिक्कत होती है. आइए. हल्की-फुल्की बातों की तरफ बढ़ें. अपने दोस्तों में एक सर्वेक्षण करें. मधुबनी के कितने दोस्तों के पास मधुबनी पेंटिंग है या कभी उन्होंने दोस्तों को भेंट में दी हो?

पिछली बार बार कब भागलपुरिया सिल्क का कुर्ता सिलवाया था हमने? कितने लोग जानते हैं कि बोधगया मंदिर ट्रस्ट का मुखिया सिर्फ़ हिन्दू जिलाधिकारी हो सकता है, कोई और धर्म का अधिकारी नहीं? अगर हमें यह जानकारी भी है तो इसके बारे में हमने कभी बोला या लिखा?

आधुनिक विकास की वासना में जकड़ा बिहार कभी सुखी नहीं हो सकता. अपनी जड़ों से कटकर हम कहीं के नहीं रहेंगे.

इसे त्रासदी कहें या बिडम्बना कि जिस समझदारी ने बिहार को देश के सबसे ग़रीब क्षेत्रों में से एक बना दिया वही मुद्दा इस चुनाव में सबसे धारदार हथियार है.

मैं ‘विकास’ की बात कर रहा हूँ. दशकों से विकास के नाम पर बिहार के खनिज की लूट हुई, पानी का दोहन हुआ और ग़रीब बिहारियों को राष्ट्र-निर्माण के युद्ध में मज़दूर बना कर झोंक दिया गया.

देश की राजनीति में बिहारी नेताओं के मजबूत दख़ल के बावजूद बिहार के साथ केंद्र के लगातार अन्याय के ख़िलाफ़ कोई आवाज़ बुलंद नहीं हुई.

बिहार की अगड़ी जातियों के एक हिस्से ने पिछड़ों के एक हिस्से के साथ मिलकर लगातार फ़ायदा उठाया और शेष बिहार में ‘पीड़ित’ होने की ग्रंथि डाल दी.

उसने अपने राजनीतिक और सामाजिक स्वार्थ के लिये बिहार को गर्त में डाला और उस गर्त का जिम्मा दूसरों पर डाल कर उसका का भी लाभ लिया. यह आश्चर्य नहीं है कि इन्हीं सामाजिक वर्गों का राजनीति, ज़मीन, ठेकेदारी, खनन, व्यापार और नौकरियों में लगातार वर्चस्व बना हुआ है.

यही वर्ग ग़रीब बिहारियों के साथ होने वाले भेदभाव पर सबसे ज़्यादा घड़ियाली आंसू बहाता और फ़र्ज़ी गुस्सा जताता है.

इसने लगातार बिहारियों के मानस में यह भावना घर होने दी कि बिहारियों को देश में अपमानित होना पड़ता है लेकिन उस स्थिति को बदलने कि ज़हमत कभी नहीं उठायी. इसी वर्ग का एक हिस्सा आज बिहार से बाहर विभिन्न क्षेत्रों में जमा हुआ है और अच्छी सामाजिक-आर्थिक हैसियत में है.

एक बार फ़िर वह दांव चल रहा है और अपने-अपने स्तर से बिहार के चुनाव में दख़ल दे रहा है. हमेशा की तरह यह दख़ल उसके मध्यवर्गीय और जातीय चरित्र के अनुकूल ही है, न कि बिहार को बदलने की कोई चेतन सोच से प्रेरित है.

कई लोग मेरी बात को सतही सरलीकरण कह कर ख़ारिज़ करने की कोशिश करेंगे. मेरा निवेदन है कि ऐसा करने से पहले वे अपने बिहारी मित्रों से एक बार फ़िर बातचीत करें, सोशल मीडिया में उनकी बतकही पर नज़र डालें और थोड़ा ठहर कर सोचने की कोशिश करें.

बीबीसी संवाददाता सुशील झा से बातचीत पर आधारित

बी बी सी हिंदी पर प्रकाशित


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