अरब से आज़ादी की अज़ान

प्रकाश के रे बरगद के संपादक हैं.

…कितनी बार एक  आदमी सर उठाएगा कि वह आकाश देख सके,
एक आदमी के पास कितने कान होने चाहिए कि वह लोगों का रोना सुन सके,
कितनी लाशों के बाद वह जान सकेगा कि बहुत सारे लोग मारे जा चुके हैं…
इन सवालों के जवाब, मेरे दोस्त, हवाओं में गूंज रहे हैं….

बॉब डेलन के एक बहुत पुराने गीत की यह कुछ पंक्तियाँ हैं. अरब और उत्तरी अफ्रीका की सड़कों पर इन सवालों के जवाब बदलाव के नारों में तब्दील हो चुके हैं. तानाशाही के ख़िलाफ़ जनता का हूजूम लगातार लड़ रहा है और लीबिया, बहरीन और यमन के शासकों के ख़ूनी दमन का सामना कर रहा है. ट्यूनीसिया और मिस्र में तुरंत मिली सफलताओं ने यह उम्मीद जगा दी थी कि बाकी शासक भी लोकतान्त्रिक जन-उभार के सामने ज़्यादा देर टिक नहीं सकेंगे. लेकिन लीबिया, बहरीन और यमन में चल रहे भयानक दमन तथा सऊदी अरब में शुरू से ही ज़बरदस्त पहरेदारी ने इस उम्मीद को थोड़ा झटका दिया है. लेकिन स्थिति को अगर गौर से देखें तो इस क्षेत्र में लोकतान्त्रिक संभावनाएं अत्यंत मज़बूत हो कर उभरी हैं.

अरब के इस क्रांति-बसंत को थके हुए और कुंद पड़ गयी समझदारियों के साये में नहीं समझा जा सकता. पहली सावधानी तो यह बरतनी होगी कि जनवाद, लोकतंत्र, चुनाव जैसे शब्दों का बेजा इस्तेमाल ना किया जाये. अरब की जनता चुनावों के सच से वक़िफ़ है क्योंकि ये सभी तानाशाह तकनीकी रूप से चुने हुए होते हैं. जिन देशों में राजशाही है, वहाँ भी चुनाव की नौटंकी होती है. लेकिन इन चुनावों में जमकर धांधली, ठगी और हिंसा का सहारा लिया जाता है तथा बार-बार यही तानाशाह और शासन के पुराने लोग चुन कर आ जाते हैं. आश्चर्य की बात नहीं हैं कि लीबिया के गद्दाफ़ी बयालीस साल से, यमन के सालेह बत्तीस साल से और बहरीन के शाह तीन दशकों से भी अधिक सत्ता पर काबिज़ हैं. गद्दी से हटाए जा चुके मिस्र के मुबारक और ट्यूनीसिया के बेन अली भी तीन दशक से राज कर रहे थे. यही कारण है कि अरब और उत्तरी अफ़्रीका के क्रांतिकारी लोकतंत्र की जगह आज़ादी और स्वाभिमान जैसे शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं. उन्हें सिर्फ़ सत्ता-परिवर्तन की दरकार नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, सत्ता पर पारिवारिक कब्ज़ा और दमन की जगह मानवाधिकार, बिना किसी भय के जीवन में चुनने का अधिकार, खुली ज़िंदगी की चाहत है.

लोकतंत्र इन अधिकारों को पाने की दिशा में एक ज़रूरी कदम तो है और इसके लिये यह भी ज़रूरी है कि तानाशाहों को हटाया जाये, लेकिन अरबी जन-मानस समूचे सत्ता-तंत्र में प्रभावी परिवर्तन चाहता है. यही कारण है कि ट्यूनीसिया के बेन अली के भागने के बाद बनी सरकार को भी लोगों ने इस्तीफ़े के लिये मजबूर कर दिया और ठीक ऐसा ही मिस्र में भी हुआ. जब लीबिया में आन्दोलन शुरू हुआ तो गद्दाफ़ी ने शासन-तंत्र में बदलाव की बात कही, बहरीन के अल-खलीफा शाहों ने भी सुधार का वायदा किया, यमन के सालेह ने कहा कि वह दुबारा राष्ट्रपति पद के लिये खड़े नहीं होंगे. लेकिन स्वतंत्रता और स्वाभिमान की लड़ाई ने सौदा करने से माना कर दिया. जौर्डन, अल्ज़ीरिया, सीरिया और सऊदी अरब के शासकों ने भी लोगों की मांगों पर ध्यान देने की बात कही है. लेकिन इन देशों में भी क्रांति की चिंगारी अन्दर-अन्दर दहक रही है.

मुक्ति की चाह आदमी की मूलभूत चेतना का ज़रूरी हिस्सा है. अरब में उसी का साकार रूप हम आज देख रहे हैं. अरब पर नज़र रखने वाले कुछ पंडितों की माने तो इसकी पृष्ठभूमि उस दिन से तैयार होने लगी जब 1990 के बाद सेटेलाईट टेलीविज़न का आगमन हुआ. इसने इस क्षेत्र में विचारों और सूचनाओं पर लगी पहरेदारी को कुरेदना शुरू किया. इस प्रक्रिया को इंटरनेट ने बड़ी तेज़ी दी. अरब के देशों में बड़े परिवारों का चलन है. पिछले कुछ दशकों से वहाँ जनसख्या का बड़ा विस्तार हुआ है. नतीज़तन, अरब में युवाओं की बड़ी संख्या है जो विश्व में और कहीं नहीं मिलती. जनसंचार के माध्यमों ने इन युवाओं और किशोरों में वैश्विक जीवन के आकर्षणों की ओर उन्मुख किया. लेकिन रोज़गार की अनुपलब्धता ने उन्हें निराशा और क्षोभ से भी भर दिया. बूढ़े होते जा रहे अरबी सत्ताओं की लोलुपता, बेइंतहा अधिकारों और अय्याशियों ने युवाओं को क्रोधित कर दिया. लेकिन उन्हें कोई राह भी नहीं दीख रही थी. पश्चिमी देशों की तेल की लालच ने जहाँ एक ओर तानाशाहों को शह दिया, वहीं उसने विरोध के नाम पर कट्टरपंथी ताकतों को हवा दी. छिट-पुट विरोधी दल हतोत्साहित थे और विरोध की किसी भी आवाज़ को भयानक दमन का शिकार होना पड़ता था.

लोगों ने छोटे स्तर पर संगठित होना शुरू किया और अपनी रणनीति पर काफ़ी सोच-विचार किया. मिस्र में पिछले साल हुआ 6 अप्रैल आन्दोलन इसी का नतीजा था जिसे कुचल दिया गया था. लेकिन ट्युनिसिया की अप्रत्याशित सफलता ने पूरे क्षेत्र में भरोसे की लहर उठा दी. उल्लेखनीय है कि ट्युनिस में आन्दोलन की शुरुआत छोटे पैमाने पर हुई थी जो कुछ दिनों में ही बड़े जन-उभार में बदल गयी और बेन अली को भागना पड़ा. बेन अली उस हिस्से का सबसे मज़बूत शासक माना जाता था और स्थिरता तथा विकास के उदहारण के तौर पर पेश किया जाता था. बेन अली के भागते ही मुबारक के ख़िलाफ़ आन्दोलन तेज़ हो गया. साथ ही कई देशों में बड़े-बड़े प्रदर्शन होने लगे. यह भी ध्यान देने की बात है कि इन आन्दोलनों का नेतृत्व परंपरागत विपक्ष, कट्टरपंथी तबके या संगठित समूहों के हाथ में न हो कर युवाओं के हाथ में है जिसमें देर-सबेर सबको भागीदारी करनी पड़ी है.

लीबिया का आन्दोलन भी कम दिलचस्प नहीं है. दो वकीलों की गिरफ़्तारी के विरोध में निकला जुलूस आज गद्दाफ़ी के गले में फांस बन चुका है. अपनी सेना के बूते और तथाकथित सभी दुनिया के ढुलमुल रवैये की वज़ह से भले गद्दाफ़ी आज भी सत्ता पर काबिज़ हों, लेकिन दमन अरब के युवाओं के हौसले पस्त नहीं कर सकता. युवाओं ने आज़ादी की झलक देख ली है. उन्हें अब रोका नहीं जा सकता. जो लोग अरब के भविष्य की चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं कि वहाँ कट्टरपंथ आ जायेगा या फ़िर यह कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का क्या होगा, उन्हें चुप बैठना चाहिए और अपने से यह सवाल पूछना चाहिए कि जब अरब की जनता अपने शासकों की अय्याशी और दुनिया के विकास का ईंधन बन रही थी, तब वे कहाँ थे! 

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