टीवी में निजी पूंजी निवेश ने सिनेमा को बड़ा झटका दिया: मणि कौल

25 दिसंबर 1944 – 6 जुलाई 2011

मणि कौल का यह साक्षात्कार यूनेस्को कूरियर के जुलाई-अगस्त 1995 के सिनेमा के सौ साल के अवसर पर विशेषांक में पृष्ठ 36 -37 पर छ्पा था। इसका अंग्रेज़ी से अनुवाद बरगद के सम्पादक प्रकाश के रे ने किया है.

आप सिनेमा से कैसे जुड़े और यह लगाव किस तरह आगे बढ़ा?

सिनेमा से मेरा परिचय होने में कुछ देर लगी क्योंकि बचपन में मैं ठीक से देख नहीं पाता था। तेरह साल की उम्र में डॉक्टरों को मेरी आंखों की बीमारी का इलाज समझ में आया। वही समय था, जब दुनिया को मैंने पाया – जैसे बिजली के तार, इन्हें मैं पहली दफा देख सकता था। और फिर सिनेमा। जहां तक मुझे याद आता है जिस फिल्म ने मुझे सबसे पहले प्रभावित किया, वह थी अमरीकी कॉस्टयूम ड्रामा – हेलेन ऑव ट्रॉय।

शुरू में मेरी इच्छा अभिनेता बनने की थी। स्वाभविक रूप से यह मेरे पिता को पसंद न था। कुछ समय बाद मैंने एक डॉक्यूमेंट्री देखी, जिससे मुझे यह ज्ञान हुआ कि फिल्में बिना अभिनेताओं के भी बन सकती हैं। इसने मेरी आंखें खोल दी। मुझे अब भी याद है कि वह फिल्म कलकत्ता शहर के बारे में थी।

सौभाग्य से मेरे एक चाचा बंबई में फिल्म निर्देशक हुआ करते थे, जो कि काफी जाने-माने थे। उनका नाम महेश कौल था। मैं उनसे मिला और उन्होंने मेरे पिता से निवेदन किया कि वे मुझे फिल्मों में जाने दें। उन्होंने यह भी सलाह दी कि मुझे पुणे के फिल्म स्कूल में भेज दिया जाए। मैंने वहां (पुणे में) तीन साल बिताया और अब भी मेरे पास वहां की ढेर सारी यादें हैं। खासकर मुझे एक विलक्षण शिक्षक की याद है – ऋत्विक घटक, जो खुद भी फिल्म निर्देशक थे। मैंने उनके मार्गदर्शन में पढ़ाई की और मेरे ख्याल से मैं उनका सबसे प्रिय छात्र था। लेकिन मैंने उन्हें धोखा दिया। जब मैंने रॉबर्ट ब्रेसों की पिकपॉकेट देखी, तो उसने मेरा नजरिया ही बदल दिया। उसके बाद तो बस मैं ब्रेसों में ही रम गया। एक अरसे बाद मैं उनसे पेरिस में मिला। वह दिन मेरे लिये स्वर्णिम था।

उन्हीं दिनों एक भारतीय फिल्म ने मुझे गहरे तक प्रभावित किया। वह फिल्म अबरार अल्वी की साहिब, बीबी और गुलाम थी, जो उन्होंने गुरुदत के साथ बनायी थी। मैंने इस फिल्म को करीब बीस बार देखा। जयपुर में मेरे दोस्त का सिनेमाघर था। इस फिल्म में एक जमींदार परिवार की बरबादी बयान की गयी है। पूरे भारत में यह फिल्म बड़ी हिट हुई थी। मैंने कई अमरीकी फिल्में और दिग्गज भारतीय फिल्मकारों की फिल्में भी देखी।

मैंने फिल्में बनाने की शुरुआत डॉक्यूमेंट्री फिल्मों से की, जो कमीशन की जाती थीं। 1968 में मैंने पहली फीचर फिल्म का काम शुरू किया। कई महीनों की हड़ताल के कारण इसे पूरा होने में दो साल लग गये। इसके बाद भी मुझे जब भी मौका मिला मैंने डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनायी। अपनी फिल्मों में थियेटर, संगीत और भारतीय गीतों में अपनी रुचि का पूरा इस्तेमाल किया। अपने रुझानों को किनारे किये बिना मैंने दर्शकों से संबंध बनाने का भी मैंने पूरा ध्यान रखा, जो हम फिल्मकारों के लिए अपरिहार्य है।

भारत में टेलीविजन पर आपकी क्या राय है?

इसकी शुरुआत तो 1960 के दशक के शुरू में हो गयी थी लेकिन 1982 के एशियाई खेलों का प्रसारण बड़ी घटना थी। इंदिरा गांधी के दौर में टेलिविजन को शिक्षा का माध्यम समझा जाता था। सब कुछ राज्य के अधीन था। ऐसा लंबे अरसे तक रहा। हर हफ्ते बस एक फिल्म दिखायी जाती थी। बाकी कार्यक्रम ज्यादातर कृषि और उद्योग से जुड़े होते थे (कम्युनिस्ट देशों की तरह)। कुछ कार्यक्रम संगीत, योग और विज्ञान के भी होते थे। इसका सिनेमा से किसी भी तरह की कोई प्रतियोगिता नहीं थी।

1984 में यह सब बदल गया। इसका पहला कारण था पाइरेट वीडियो का आना। कॉपीराइट की व्यवस्था के अभाव ने इसे खूब बढ़ावा दिया। खराब स्थितियों में बनायी गयी नकली कापियों को दिखाने वाले वीडियो हॉल देश भर में खुल गये।

इसी समय टेलीविजन भी बदला। इसने धारावाहिक बनाने शुरू कर दिये और इसमें निजी पूंजी का निवेश होने लगा। पाइरेट वीडियो के बाद यह दूसरा खतरा था। इससे सिनेमा को भारी झटका मिला। बड़ी संख्या में फिल्मों को नुकसान हुआ जो कि अब तक नहीं होता था।

आज आमतौर पर पच्चीस चैनल दिखाये जा रहे हैं और यह संख्या बढ़ती जा रही है। सीएनएन और एमटीवी जैसे अमरीकी चैनलों के साथ कई विदेशी चैनल भी उपलब्ध हैं। इससे भारतीय लड़कियां अपनी पारंपरिक वेश-भूषा छोड़ जींस और अन्य पश्चिमी परिधान पहनने लगी हैं।

सिनेमा और टेलीविजन दोनों का दर्शक भी बदला है। अश्लीलता और हिंसा बाकी जगहों की तरह यहां भी बढ़ी है। और ये निजी चैनल सब एक जैसे ही हैं। सब कमोबेश एक जैसे कार्यक्रम ही दिखाते हैं।

क्या अब पहले से कम फिल्में बन रही हैं?

नहीं। आश्चर्य है कि फिल्मों की संख्या पर कोई असर नहीं पड़ा है और फिल्म-निर्माण का भूगोल भी नहीं बदला है। कुल पच्चीस राज्यों में से चार राज्यों में आधे से अधिक फिल्में बनती हैं। सबसे अधिक फिल्में तमिलनाडु (तमिल) और तेलुगु में बनती हैं। हिंदी फिल्मों का स्थान तीसरा है। आंध्रप्रदेश भी एक बड़ा निर्माता है। इन जगहों में कोई भी एक फिल्म बनती है, तो बाकी तीन भाषाओं में इनका तुरंत अनुवाद हो जाता है।

(तेलुगु आंध्रप्रदेश की भाषा है। यहां श्री मणि कौल का मतलब कन्नड़ से हो सकता है। कर्नाटक फिल्मोद्योग भी समृद्ध है : अनुवादक)

मुख्यधारा में गतिहीनता के साथ भारतीय भाषाओं में डब की गयी अमरीकी फिल्मों की आमद से सबसे बड़ा खतरा है। यह हमला शुरू हो चुका है। हमें समझ में नहीं आ रहा है कि हम इनका कैसे मुकाबला करें। हमने अपनी दीवार को मजबूत किला समझ लिया था। लेकिन अपनी शक्तिशाली विशिष्टता के बावजूद भारत के सामने एक बड़ा खतरा है – वास्तविक भारतीय छवियों, शब्दों और सिनेमा के धीरे-धीरे खोते जाने का, पहचान को खो देने का।

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