एक योद्धा का समर-शेष

चन्दन श्रीवास्तव  http://www.im4change.org से जुड़े हैं. उनके आलेख समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते हैं. चन्दन से chandan@csds.in पर संपर्क किया जा सकता है.

चन्दन श्रीवास्तव

सितंबर का महीना नेल्सन मंडेला के लिए कई वजहों से खास रहा। महीने की तेरह तारीख को सोशल-मीडिया साईट ट्वीटर की मेहरबानी से इंटरनेट पर यह अफवाह फैली कि नेल्सन मंडेला इस दुनिया में नहीं रहे। अफवाह फैलने के चौबीस घंटे के अंदर एसोसिएटेड प्रेस और रॉयटर जैसी समाचार एजेंसियों ने मंडेला फाऊंडेशन के हवाले से स्पष्ट किया कि मंडेला स्वस्थ और प्रसन्न हैं। इस महीने उनके बारे में कुछ खबरें और आई हैं। एक तो यही कि मंडेला के घर एक पड़पोता हुआ है, और यह भी कि दक्षिण अफ्रीका के बीमार कपड़ा उद्योग को गति देने के लिए एक कंपनी मंडेला के नाम का उपयोग कर रही है। उसने 46664 अपेरेल के नाम से कपड़ों का एक ब्रांड तैयार किया है। मंडेला जब रॉबेन द्वीप पर कैद थे तो दक्षिण अफ्रीका की तत्कालीन रंगभेदी सरकार की जेल उन्हें कैदी नं-46664 से पुकारती थी। और अभी दो रोज पहले की खबर है कि न्यूयार्क की एक संस्था रेपुटेशन इंस्टीट्यूट ने 25 देशों के 51000  लोगों से दुनिया के 54 हस्तियों के बारे में सवाल करके पाया है कि नेल्सन मंडेला उनके बीच सर्वाधिक पसंद की जाने वाली शख्शियत हैं यानी बराक ओबामा, एजेंलिना जॉली, रोजर फेडरर, दलाई लामा और मनमोहन सिंह जैसी चर्चित हस्तियों से कहीं ऊपर।

इन खबरों से इतना तो निष्कर्ष निकाला ही जा सकता है कि नेल्सन मंडेला में लोगों की रुचि लगातार बढ़ी है। फिर मन हुआ कि इस रुचि की सीमा के बारे में सोचें । सोचें कि क्या परपोते के जन्म पर खुश होते, किसी कपड़ा-उद्योग के लिए ब्रांडनेम बनते या फिर फुटबॉल की विश्वकप प्रतियोगिता दक्षिण अफ्रीका में करवाने से लेकर दुनिया को एड्स के बारे में जागरुक करते इसी नेल्सन मंडेला से दुनिया प्यार करती है ? क्या मंडेला की यह छवि उस मंडेला से मेल खाती है जिसके बारे में समीक्ष्य पुस्तक( नेल्सन मंडेला: मेरा जीवन–  बातो-बातो में) की भूमिका में बराक ओबामा ने लिखा है कि- “हममें से बहुतों के लिए वह मनुष्य से कहीं ज्यादा थे- वह दक्षिण अफ्रीका और दुनिया भर में न्याय, समानता और सम्मान के लिए किए जाने वाले संघर्षों के प्रतीक थे। ” दुनिया में ऐसे व्यक्तित्व विरले मिलेंगे जिनके जीवन की कहानी उनके देश की आजादी की कहानी भी हो। नेल्सन मंडेला की संघर्ष-कथा एक कुचली हुई सभ्यता के जाग्रत और दुर्दम्य स्वाभिमान की कथा है। इसलिए, उनके जीवित रहते दुनिया शायद ही कभी मान पाये कि यह योद्धा थक गया या फिर रिटायरमेंट का जीवन जी रहा है।

भले ही मंडेला आधिकारिक तौर पर रिटायरमेंट का जीवन जी रहे हैं लेकिन दक्षिण अफ्रीका से बहुत दूर बैठा कोई व्यक्ति यह उम्मीद लगाये कि दक्षिण अफ्रीका की राजनीति को उनकी जरुरत आखिरी सांस तक रहेगी तो यह कोरी नायक-पूजा नहीं होगी। अगर एक व्यापक धरातल पर मंडेला की छवि आदमी-आदमी के बीच गैर-बराबरी कायम करने वाले विधानों के खिलाफ अनथक लड़ने वाले योद्धा की है तो वे कैसे मान सकते हैं कि उनका समर अब शेष हुआ। इसी हफ्ते जब खबर आई कि अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस की सरकार राजकीय सूचनाओं को गोपनीय रखने का कानून बनाने वाली है और लोग इस कानून के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं तो सोचने को मन हुआ कि जिस दल की तरफ से मंडेला रंगभेद-मुक्त दक्षिण-अफ्रीका के प्रथम राष्ट्रपति बने उसी दल की सरकार के इस कदम के बारे में उनका रुख क्या है ? लेकिन जवाब नदारद था और शंका जागी कि क्या दक्षिण अफ्रीका ने अब अपने राष्ट्रपिता को बस आशीर्वाद दे सकने वाले एक संत की मूर्ति में तब्दील कर दिया है  ?

समीक्ष्य पुस्तक भी मंडेला की मौजूदा लोकप्रियता में ही अपनी खास बनावट के कारण एक नया अध्याय जोड़ने की कोशिश करती है। वह योद्धा-मंडेला के जीवन और सपनों का जिक्र कम करती है मगर व्यक्ति-मंडेला की आशंकाओं और आत्मालोचन के अनदेखे कोनों में जरुर ले जाती है।  बराक ओबामा ने पुस्तक की भूमिका में यही माना है- “अपनी पूरी तस्वीर इस पुस्तक में प्रस्तुत करके नेल्सन मंडेला हमें याद दिलाते हैं कि वे पूर्ण व्यक्ति नहीं रहे- और दूसरे आदमियों की तरह उनमें भी कमियां हैं लेकिन ये कमियां ही वे बातें हैं जो हमें प्रेरित कर सकती हैं। ” पुस्तक की प्रस्तावना में नेल्सन मंडेला सेंटर ऑव मेमॉरी एंड डायलाग्स के प्रोजेक्ट प्रमुख वर्न हैरिस ने भी यही लिखा है कि मंडेला अपने अगणित लेखों, आत्मकथा और साक्षात्कारों में “ नेता हैं, राष्ट्रपति हैं, जनता के प्रतिनिधि हैं, एक प्रतिमा हैं। कहीं-कहीं जरुर उनका व्यक्तिगत चरित्र झलक उठता है, और यह प्रश्न शेष रहता है कि वे वास्तव में कौन हैं ? ” हैरिस की मानें तो- “ यह पुस्तक ‘ मेरा जीवन- मेरी बातो-बातों ’ में नेल्सन मंडेला की सार्वजनिक छवि के पीछे, उनके व्यक्तिगत कागज-पत्रों के माध्यम से उनका वास्तविक चरित्र प्रदर्शित करती है। ”

सवाल उठता है क्या मंडेला का वास्तविक चरित्र उनकी चुनिन्दा चिट्ठियों, नोट्स, डायरी के चयनित अंश आदि के आधार पर सामने आ सकता है? महात्मा गांधी और नेल्सन मंडेला जैसी शख्सियतें किंवदन्तियों में तब्दील ही होती हैं इसलिए कि उनका सार्वजनिक उनके निजी के साथ दूध-पानी के समान घुला-मिला होता है। बहुत कोशिशों के बावजूद नीर-क्षीर विवेकी वह पद्धति नहीं मिल पायी है जो उनके व्यक्तिगत को सार्वजनिक से अलगा सके। मंडेला के व्यक्तित्व की बुनियादी बनावट में ऐसा कुछ है जो अपने बारे में व्यक्ति-राग के अलाप का एक सीमा के बाद निषेध कर देता है। गौर करें, समीक्ष्य पुस्तक में ही प्रकाशित मंडेला की एक अप्रकाशित आत्मकथा का यह अंश- “ किसी स्वातंत्रय-योद्धा की आत्मकथा इस बात से भी प्रभावित होती है कि विशेष तथ्यों का उद्धाटन , चाहे वे कितने भी सत्य क्यों ना हों, संघर्ष में सहायक होंगे या नहीं। ऐसी स्पष्टवादिता जिससे व्यर्थ के तनाव उत्पन्न होते हों और विभाजन की स्थितियां बनें, जिसका शत्रु लाभ उठाये और संघर्ष में रोक पैदा हो वह खतरनाक है और उससे बचना चाहिए। ”  मंडेला के सार्वजनिक को उनके व्यक्तिगत से अलग करने वाले किसी प्रयास को यह भी ध्यान में रखना होगा कि स्वयं मंडेला के लिए आत्मकथा की परिभाषा क्या है। मंडेला आत्मकथा में व्यक्ति- आत्म का जिक्र  तभी प्रामाणिक मानते हैं जब वह परिजन-पुरजन के जिक्र के साथ आये। वे लिखते हैं – “ किसी भी व्यक्ति की जीवनकथा में उसके राजनीतिक सहयोगियों, उनके व्यक्तित्व तथा विचारों का ईमानदार विवेचन होना चाहिए। पाठक यह जानना चाहेगा कि लेखक किस प्रकार का व्यक्ति है, दूसरे के साथ उसके संबंध कैसे हैं और यह सब विशेषणों से नहीं बल्कि स्वयं तथ्यों से व्यक्त होना चाहिए। ” पुस्तक में परिजन-पुरजन के बारे में बात करते मंडेला हैं, मंडेला के बारे में बात करते परिजन-पुरजन नहीं।

बहरहाल जिन पाठकों ने मंडेला की आधिकारिक आत्मकथा लॉग वाक टू फ्रीडम पढ़ी है उनके लिए मंडेला की “अब तक अज्ञात निजी डायरियों, चिट्ठियों, लेखों  भाषणों और संवादों पर आधारित विश्व की 28 भाषाओं में एक साथ प्रकाशित यह पुस्तक निश्चित ही रुचिकर साबित होगी।

पुस्तक  –          नेल्सन मंडेला : मेरा जीवन– बातों-बातों में(2011)

अनुवाद- महेन्द्र कुलश्रेष्ठ, पृष्ठ-368, मूल्य-595 रुपये(सजिल्द)

प्रकाशक- ओरिएंट पब्लिशिंग दरियागंज,नई दिल्ली, पृष्ठ-368, मूल्य-595 रुपये(सजिल्द)

दैनिक भास्कर, नई दिल्ली/ 24 सितंबर

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