”द फॉरेस्ट’ बनाने के दौरान मैंने वह सब किया, जिनसे गुरुजन परहेज करने की हिदायत देते हैं…’

प्रकाश के रे बरगद के संपादक हैं.

→ मेरा विश्वास है कि हिंदुस्तान में सिनेमा का वृहत भविष्य है और सरकार को इसके प्रदर्शन पर नियंत्रण रखना होगा, क्योंकि दर्शकों की रुचि पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

निदेशक, अपराधिक गुप्तचर विभाग, मई 4, 1915

→ सेंसर की कठोर नियमावली और कठोरता से उसके पालन को सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है।

आर बी दिवाकर, सूचना एवं प्रसारण मंत्री।
(सेंसर बोर्ड की कलकत्ता में हो रही बैठक में 5 नवंबर, 1951 को भेजे संदेश में)

→ फिल्मों के निर्माण और प्रदर्शन पर सेंसरशिप समाज के व्यापक हित में है।

सर्वोच्च न्यायलय, 1970
ख्वाजा अहमद अब्बास के फिल्म को सेंसर करने के मामले में चल रहे मुकदमे के फैसले में।

हिंदुस्तानी सिनेमा का इतिहास इस सिनेमा पर सेंसर के नियंत्रण का इतिहास भी है। जब इस महीने की तीन तारीख को देश में सिनेमा की शुरुआत के सौंवे साल की शुरुआत हो रही थी, तब सिनेमा और सेंसर के इस चोली-दामननुमा रिश्ते का अजब नमूना देखने को मिला। सरकार ने इस सौंवे साल की शुरुआत राष्ट्रीय पुरस्कारों के वितरण समारोह से की। इस समारोह में एक ऐसी फिल्म को पुरस्कृत किया गया, जिसके सार्वजनिक प्रदर्शन पर सेंसर ने रोक लगा दी है।

इस फिल्म का नाम‘इंशाल्लाह फूटबॉल’ है और इसके निर्देशक अश्विन कुमार हैं। अश्विन कुमार हमारी पीढ़ी के शायद एकमात्र निर्देशक हैं, जिनकी फिल्म ‘लिटिल टेररिस्ट’ (2005) को ऑस्कर पुरस्कारों के लिए नामांकित किया गया था। यह महत्वपूर्ण बात न हो क्योंकि कई लोगों का मानना है कि हमारी फिल्मों के स्तर का निर्धारण किसी विदेशी संस्था या पुरस्कारों के पैमाने पर करना ठीक नहीं है। लेकिन ‘लिटिल टेररिस्ट’ का ऑस्कर जाना इसलिए बड़ी बात है कि यह एक लघु फिल्म है और हमारे यहां लघु फिल्मों का चलन नहीं है। पिछले सालों में फिल्म फेस्टिवलों के आयोजन और फिल्म बनाने की तकनीक के अपेक्षाकृत सुलभ और सस्ता होने के कारण अब ऐसी फिल्में बनने लगी हैं लेकिन अब भी उनका दायरा अत्यंत सीमित है। अभी भी न तो उनका कोई बाजार है और न ही सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन की जगहें। ऐसे में अश्विन की फिल्म ने फिल्म बनाने की आकांक्षा रखने वाली हमारी पीढ़ी के युवाओं को प्रेरणा और साहस प्रदान करने का काम किया। इतना ही नहीं, इस फिल्म और इससे पहले बनी उनकी पहली फिल्म रोड टू लद्दाख (2004) को बनाने के उनके अनुभवों ने भी इस पीढ़ी को बहुत कुछ सिखाया है।

अश्विन कुमार

‘इंशाल्लाह फूटबॉल’ कश्मीर की कहानी है और ऊपर उल्लिखित फिल्मों से अलग एक डॉक्यूमेंट्री है। इसी शृंखला में उनकी एक और फिल्म है, ‘इंशाल्लाह कश्मीर’। यह फिल्म भी सेंसर के पास लटकी हुई है। सेंसर के पचड़ों से परेशान होकर अश्विन ने ‘इंशाल्लाह कश्मीर’ को इस साल गणतंत्र दिवस के अवसर पर इंटरनेट पर चौबीस घंटे के लिए रिलीज किया था, जिसे लाखों लोगों ने देखा और कहीं भी कोई अशांति नहीं फैली, जिसकी आशंका सेंसर बोर्ड में बैठे देशभर के दर्जन भर चुनिंदा समझदार व्यक्त कर रहे हैं। हद देखिए, जब फिल्म पर रोक के कारणों की जानकारी लेने के लिए अश्विन कुमार ने सूचना के अधिकार के तहत आवेदन किया तो जवाब यह था कि इसमें काल्पनिक चरित्र हैं और मनगढ़ंत बातें कही गयी हैं। जरा सोचिए, इस डॉक्यूमेंट्री के बारे में इस तथाकथित नैतिक पहरुओं की यह समझदारी है, जिसमें सभी असली कश्मीरी हैं और अपने साथ हुए अन्याय-अत्याचार के बारे में बता रहे हैं।

खैर, इन मूर्खों को भी क्या दोष देना, जब हमारी संसद और न्यायालयों की नजर में ही कश्मीर की त्रासदी एक गल्प या गप्प भर बन कर रह गयी हो।

भला हो इस देश का, जहां सिर्फ सेंसर बोर्ड ही सेंसर का काम नहीं करता, यहां तो हर डाल पर सेंसर बैठा है। अश्विन दून स्कूल के छात्र रहे हैं। 2010 में दून स्कूल ने संस्थान के प्लैटिनम जुबिली के मौके पर इन्हें एक फिल्म बनाने के लिए आमंत्रित किया और अश्विन ने छात्रों को फिल्म बनाना सिखाने के क्रम एक फिल्म बनायी, ‘डैज्ड इन दून’। पहले तो स्कूल ने इस फिल्म को सराहा, लेकिन पहले ही प्रदर्शन के बाद इसे रोकने की पूरी कोशिश की। उनके हिसाब से यह फिल्म स्कूल की छवि को धूमिल करती है। फिल्म में अश्विन द्वारा गाया गाया स्कूल का गाना ‘लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी’ अब सुनना विडंबनात्मक लगता है।

बहरहाल, अश्विन धुन के पक्के हैं और सेंसर बोर्ड के विरुद्ध अभियान के लिए कृत-संकल्प हैं, लेकिन इसमें अभी थोडा वक्त है। और वह इसलिए कि उनके द्वारा निर्देशित पहली फीचर फिल्म ‘द फॉरेस्ट’ इस शुक्रवार यानि 11 मई को देशभर के पीवीआर थियेटरों में रिलीज होने जा रही है। इस फिल्म में आदमी द्वारा जंगलों में निरंतर घुसपैठ के दुष्परिणामों को थ्रिलर फॉर्मेट में दर्शाया गया है। इस फिल्म को भी ‘सिर्फ वयस्कों के लिए’ सर्टिफिकेट के साथ जारी किया गया है। बकौल अश्विन, कायदे से इसे U/A मिलना चाहिए था। पर्यावरण और पारिस्थितिक संतुलन पर जोर देती इस फिल्म में मुख्य भूमिकाएं जावेद जाफरी, नंदना सेन और अंकुर विकल ने की हैं। फिल्म की शूटिंग कॉर्बेट और बांधवगढ़ के नेशनल पार्कों में की गयी है। इस फिल्म की दो बातें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं – एक, वन्य-जीवन के दृश्यों का फिल्मांकन और ध्वन्यांकन मशहूर बेदी बंधुओं – नरेश और राजेश बेदी – द्वारा किया गया है और उन्हें सहयोग दिया है नरेश बेदी के बेटों – विजय और अजय ने। ये सभी वन्य-जीवन को लेकर अपने कामों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं और अनगिनत पुरस्कार और सम्मान पा चुके हैं; फिल्म की दूसरी महत्वपूर्ण बात उसका संगीत है जिसे लंदन के मशहूर एबे स्टूडियो में रिकॉर्ड किया गया है।

खैर, फिल्म कैसी है, इसका पता तो 11 मई को लगेगा। वैसे अश्विन के काम और सिनेमा की समझदारी को देखते हुए उम्मीदें तो स्वाभविक हैं। फिल्म में मेरी दिलचस्पी अश्विन कुमार की इस बात के बाद और बढ़ गयी है, जब वे कहते हैं – ‘द फॉरेस्ट’ बनाने के दौरान मैंने वह सब किया, जिनसे गुरुजन परहेज करने की हिदायत देते हैं…

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