‘ हम लिखने वाले पैगम्बर नहीं….’

चन्दन श्रीवास्तव  http://www.im4change.org से जुड़े हैं. उनके आलेख समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते हैं. चन्दन से chandan@csds.in पर संपर्क किया जा सकता है.

चन्दन श्रीवास्तव


जैसे लुधियाना का कस्बा समराला, जहां अब से सौ साल पहले आज ही के दिन (11 मई,1912) सआदत हसन मंटो ने जिन्दगी की पहली सांस ली, पंजाब का हिस्सा है वैसे ही शहर लाहौर भी जहां 18 जनवरी 1955 की एक दोपहर मंटो के दम की डोर टूटी।

मगर मंटो की जिन्दगी और अफसानों को समझना हो तो बात सिर्फ पंजाब कहने भर से नहीं बनती। संस्कृति का भूगोल राजनीति के भूगोल के सामने बेबस हो जाता है। बस 43 साल की जिंदगी नसीब हुई सआदत हसन मंटो को और इन सालों को समझने के लिए पंजाब शब्द में पूर्वी-पश्चिमी यानी हिन्दुस्तान और पाकिस्तान भी जोड़ना पड़ता है। विभाजन से पहले के दंगों और विभाजन के बाद की आवाजाहियों के लहुलुहान किस्सों के साये में लिपटे वही हिन्दुस्तान-पाकिस्तान जिनकी हकूमतों से मंटो की कहानी का नायक बिशन सिंह बार-बार पूछता है कि बताओ मेरा गांव टोबाटेक सिंह मुल्कों के इस बंटवारे में कहां है और हर जवाब के बाद उसके मुंह से हताशा में निकलता है- “ औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानां दि मुँग दि दाल आफ दी पाकिस्तान एंड हिंदुस्तान आफ दी दुर फिटे मुँह!” 

अपने साथ हुए अन्याय के प्रतिकार में निकला निर्रथक जान पड़ता यह वाक्य आधुनिक राष्ट्र-राज्य के निर्माण के खूनी अध्यायों के मंतव्य पर शायद बीसवीं सदी की सबसे सार्थक टिप्पणियों में एक है। इस वाक्य का अर्थ टोबाटेक सिंह नाम की पूरी कहानी में विन्यस्त है मगर सबसे मार्मिक ढंग से खुलता है आखिर में। याद करें, बिशन सिंह के प्राणांत का वर्णन- ‘ उधर खरदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था, इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान, दरमियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेक सिंह पड़ा था। ’

मंटो के बारे में यह सवाल बना रहेगा कि क्या उनके भीतर एक बिशन सिंह मौजूद था जो उम्र भर अपने लिए एक दरम्यानी जगह की खोज करता रहा, एक ऐसी जगह जिस पर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान सरीखे किसी राष्ट्रराज्य का नाम नहीं लिखा। मंटो के जो साल पाकिस्तान में गुजरे उनके बारे में मंटो का ख्याल था-“ मेरे लिए यह एक तल्ख़ हक़ीकत है कि अपने मुल्क में, जिसे पाकिस्तान कहते हैं, मैं अपना सही स्थान ढूंढ नहीं पाया हूँ. यही वजह है कि मेरी रूह बेचैन रहती है.. मैं कभी पागलखाने में और कभी अस्पताल में रहता हूँ । ”  इस बेचैनी का कारण तलाशना मुश्किल नहीं है। मंटो ने साल 1951-54 के बीच “चाचा साम” या कह लें अंकल सैम के नाम कुछ चिट्ठियां लिखीं। उस वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति हैरी ट्रूमेन थे। दक्षिण एशिया की राजनीति में अमरीकी हस्तक्षेप की मंशा को अपने धारदार व्यंग्य से बेनकाब करने वाले इन पत्रों में एक जगह आता है – “ जिस तरह मेरा मुल्क कटकर आजाद हुआ, उसी तरह मैं कटकर आजाद हुआ और चचाजान, यह बात तो आप जैसे हमादान आलिम से छुपी हुई नहीं होनी चाहिए कि जिस परिंदे को पर काटकर आजाद किया जाएगा, उसकी आजादी कैसी होगी ” परकटे परिन्दे के रुपक को आगे बढाकर पूछें कि उसके पर कहां हैं ?

अपनी आजादी को परकटे परिन्दे की आजादी के रुप में देखने वाले मंटो का उत्तर होगा- “ मेरा नाम सआदत हसन मंटो है और मैं एक ऐसी जगह पैदा हुआ था जो अब हिन्दुस्तान में है- मेरी मां वहां दफन है, मेरा बाप वहां दफन है, मेरा पहला बच्चा भी उसी जमीन में सो रहा है जो अब मेरा वतन नहीं- मेरा वतन अब पाकिस्तान है, जो मैंने अंग्रेजों के गुलाम होने की हैसियत से पाँच-छह मर्तबा देखा था। ”  खुद की तस्वीर परकटे परिन्दे के रुप में देखने वाले मंटो के दर्द की दवा के लिए दोनों मुल्कों में बस एक दरम्यानी जगह बची हुई है- इसका नाम या तो अस्पताल है या फिर पागलखाना यानी वे जगहें जहां आप पहुंचते ही तब हैं जब किसी वजह से आपका राष्ट्र-राज्य का सक्रिय नागरिक होना आपके “ठीक” होने के वक्त तक के लिए ठहर जाता है। एक कलाकार के रुप में मंटो को लगता था, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान  उनकी कला की परवाज को रोकने वाली जगहें साबित हुई हैं –  “मैं पहले सारे हिन्दुस्तान का एक बड़ा अफसानानिगार था, अब पाकिस्तान का एक बड़ा अफसानानिगार हूं..सालिम हिन्दुस्तान में मुझ पर तीन मुकदमे चले और यहां पाकिस्तान में एक लेकिन इसे अभी बने कै बरस हुए हैं।”

जैसे मंटो की जिन्दगी अपने लिए राष्ट्रराज्यों की परिकल्पना से अलग एक दरम्यानी जगह तलाशती है वैसे ही उनकी कहानियां भी। उनकी कहानियां समाज और राजनीति की बनी-बनायी सच्चाइयों के बरक्स कला का निजी सत्य तलाशती है, वह सत्य जो समाज की सिखावनों और राजनीति के वादों में नहीं अंट पाता। मंटो को मलाल रहा कि उन्हें अदबी दुनिया आखिर-आखिर तक नहीं समझ पायी। मंटो को उनके जमाने में प्रगतिशीलता के वाद से बांधकर देखा गया लेकिन मंटो को लगा उनकी कहानियां का सच किसी वाद के कठघरे में बांधा नहीं जा सकता। “चाचा साम” के नाम लिखे पत्रों में ही आता है- “ पहले तरक्कीपसंद मेरी तहरीरों को उछालते थे कि मंटो हममें से है। अब यह कहते हैं कि मंटो हम में नहीं है। मुझे ना उनकी पहली बात का यकीन था, ना मौजूदा पर है। अगर कोई मुझसे पूछे कि मंटो किस जमायत में है तो अर्ज करुंगा कि मैं अकेला हूं…। ” और विडंबना देखिए कि इतने खरे इनकार के बावजूद मंटो की कहानियों को प्रगतिशीलता के चश्मे लगाकर पढ़ने का चलन आज भी जारी है। मिसाल के लिए गोपीचंद नारंग के संपादन में साहित्य अकादमी से छपी किताब “बीसवीं शताब्दी में उर्दू साहित्य” के एक अध्याय “बीसवीं शताब्दी में उर्दू कहानी”  में मंटो को प्रगतिशील अफसानानिगार मानकर उनकी  “कहानियों पर मार्क्सवाद का प्रभाव” देखने की कोशिश की गई है तो “फ्रायड की विचारधारा के अनुरुप काम भावना” और “फ्रांसीसी तर्ज का प्रकृतिवाद”  भी।  साथ ही प्रगतिशीलता का वह परिभाषा दोहरायी गई है जो कभी सज्जाद जहीर और उनके साथियों ने लंदन(1925) में प्रगतिशील आंदोलन का पहला मैनिफेस्टो तैयार करते हुए प्रस्तावित किया था- ‘ वह सबकुछ जो हममें आलोचनात्मक योग्यता पैदा करता है, जो हमें प्रिय परंपराओं को भी विवेक की कसौटी पर परखने के लिए प्रेरित करता है, जो हमें वैचारिक रुप से स्वस्थ बनाता है और हममें एकता और राष्ट्रीय एकीकरण पैदा करता है, उसी को हम प्रगतिशील साहित्य कहते हैं। ’

एकता और राष्ट्रीय एकीकरण की हिमायत करने वाली इस परिभाषा को सही मानकर मंटो को पढ़ें तो उनकी कहानी “टोबोटेक सिंह” हाथ से फिसल जाएगी, साथ ही यह सवाल भी सताएगा कि आखिर मंटो ने एक साहित्यकार के रुप में अपनी भूमिका की पहचान करते हुए यह क्यों कहा था-“ हम लिखनेवाले पैगंबर नहीं। हम कानूनसाज नहीं.. कानूनसाजी दूसरों का काम है- हम हुकूमतों पर नुकताचीनी करते हैं लेकिन खुद हाकिम नहीं बनते। हम इमारतो के नक्शे बनाते हैं लेकिन हम मैमार नहीं। हम मर्ज बताते है लेकिन दवाखानों के महतमिम ( व्यवस्थापक ) नहीं।”

मंटो को गालिब बहुत पंसद थे। सुपरहिट साबित हुई फिल्म मिर्जा गालिब की कथा मंटो ने लिखी थी। इस फिल्म का शुरुआत होती है जिस गजल से होती है उसका एक शेर है – “या रब वो ना समझे हैं ना समझेंगे मेरी बात- दे और दिल उनको जो ना दे मुझको जुबां और।” मंटो के शताब्दी-वर्ष के समापन पर हमें उनकी जुबां को समझने के लिए “और दिल ” की तलाश करनी होगी।

One reply to “‘ हम लिखने वाले पैगम्बर नहीं….’

  1. Politically and culturally Manto declared his position in Indian-subcontinent as a man of no nation he found laid on no man’s land in same way as he differentiates between progressive tendency and modernist trend. Hence he claims about himself to be a person of no institute.

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