छद्म अंबेदकरवादियों का फासीवादी चेहरा

मनीष शांडिल्य पटना में स्वतंत्र पत्रकार हैं. उनसे manish.saandilya@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

मनीष शांडिल्य

ऐसा केवल भारतीय संसद में ही संभव था कि कुछ सांसद किसी मामले को व्यक्ति या समुदाय विशेष के आस्था और सम्मान से जोड़ कर हंगामा मचाए और सरकार बिना तर्क, बहस किये अपनी गलती मान ले. और बीते शुक्रवार को ऐसा हुआ भी. पहले संसद और उसके बाद देश का समय और इसकी उर्जा एक बार फिर कार्टून के नाम पर जाया की गयी. (लेख लिखते हुए मेरी भी उर्जा बर्बाद हो रही है नहीं तो बहुत सारे दूसरे जरुरी काम करने हैं नेहरु और बाबा साहब के सपनों को पूरा करने के लिए).

कुछ दिनों पहले प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी एक कार्टून बहुत ही अपमानजनक लगा था. फिलहाल बात करते है उस कार्टून की जिसके कारण शुक्रवार को कुछ सांसदों ने हंगामा बरपाया और इसके बाद पूरे संसद ने उस हंगामे को वैधता प्रदान कर दी और जिससे आहत होकर और संसद का सम्मान करते हुए एनसीईआरटी के दो सलाहकारों, प्रोफेसर सुहास पालशिकर और डा. योगेंद्र यादव, ने एनसीईआरटी सलाहकार का पद छोड़ दिया.

साल 1949 में छपे इस कार्टून में डॉक्टर अंबेदकर एक चाबुक लिए एक घोंघे पर बैठे हैं जबकि उनके पीछे उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी चाबुक लिए खड़े हैं. यह कार्टून जाने-माने कार्टूनिस्ट केशव शंकर पिल्लई का उकेरा हुआ है जो शंकर के नाम से मशहूर हैं. कार्टून का मकसद संविधान लिखने की प्रक्रिया में हुई कथित देरी को दर्शाना लगता है. कार्टून यह बताता है कि नेहरु और आंबेडकर दोनों संविधान को जल्द तैयार होते देखना चाहते हैं, जनता की तरह, पर परिस्थितियां ऐसी हैं कि लाख जतन के बावजूद संविधान निर्माण का काम घोंघे की गति से चल रहा है. उस कार्टून के नीचे लिखा है कि संविधान बनने में तीन साल लगे तो संविधान सभा को इसका मसौदा तैयार करने में इतना समय क्यों लगा? यह कार्टून एनसीईआरटी की 11वीं कक्षा की पाठ्य पुस्तक के एक अध्याय में है.

इस अध्याय को पढ़ने से पता चलता है कि शंकर ने संविधान बनने में लगे दीर्घ समय पर कार्टून के जरिये जो व्यंग्य प्रस्तुत किया है उसको संविधान बनने की जटिल परिस्थितियों एवं गहन विचार-विमर्श के दौरों की जरूरत ने निरर्थक या कि गैरवाजिब साबित किया है. यानी कार्टूनिस्ट के व्यंग्य-विचार को पाठ ने निर्मूल साबित किया है. ऐसे में विद्यार्थी या इसे पढ़ने वाला कोई भी कार्टूनिस्ट के विचार से असहमत हो सकता है, अलग मंतव्य रख सकता है. यानी कि यह अध्याय विद्यार्थियों में व्यंग्य की इक विश्लेषणात्मक समझ विकसित करने का उद्देश्य लेकर भी चलता है.

पुस्तक के मुख्य सलाहकार द्वय सुहास पलशीकर एवं योगेन्द्र यादव ने इसी पुस्तक में ‘एक चिट्ठी आपके नाम’ शीर्षक से संबोधित विद्यार्थियों के नाम अपने सन्देश में कार्टून पर अलग से बात भी की है जो काबिलेगौर है. वे लिखते हैं: ‘अनेक अध्यायों में कार्टून दिए गए हैं. इन कार्टूनों का उद्देश्य महज हंसाना-गुदगुदाना नहीं है. ये कार्टून आपको किसी बात की आलोचना, कमजोरी और संभावित असफलता के बारे में बताते हैं. हमें आशा है कि आप इन कार्टूनों का आनंद उठाने के साथ साथ इनके आधार पर राजनीति के बारे में सोचेंगे और बहस करेंगे.’

इन तथ्यों के आलोक में किताब में विवादित कार्टून का पूरा सन्दर्भ देखें तो यह किसी भी नजरिये से डा. अंबेडकर या नेहरू के बारे में कोई पूर्वाग्रह भरा प्रतीत नहीं होता है. यह कार्टून कहीं से भी किसी के प्रति दुर्भावना या असम्मान नहीं दिखाता है. बशर्ते इसे खुले दिमाग से बस एक कार्टून के रुप में देखा जाए. एक नजर में दूसरे राजनीतिक कार्टूनों की तरह यह भी अपने समय व उस समय के राजनीतिक नेतृत्व पर कटाक्ष करता है, जिसका कि लोकतंत्र में पूरा हक है. दरअसल शंकर के कार्टून को अपमानजनक मानना ही अपने बौद्धिक स्तर का मजाक उड़ाने जैसा है. हां, अगर कोई ममता बनर्जी और हंगामाबाज सांसदों की तरह किसी भी बहाने नाराज ही होना चाहे, विवाद ही पैदा करना चाहे तो फिर यह कार्टून जरुर भड़काऊ और आपत्तिजनक है. यहां यह बताना गौरतलब है कि एक ओर खुद को वैज्ञानिक सोच, प्रगतिशील विचारों (अभिव्यक्ति की आजादी सहित) की पार्टी कहने वाले दल सीपीआई के सांसद डी. राजा को भी यह कार्टून नेहरू और डॉक्टर अंबेदकर का अपमान करता प्रतीत होता है तो दूसरी ओर लोजपा प्रमुख राम विलास पासवान दोषियों के निलंबन की ही नहीं उन पर एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा चलाने और एनसीआरटी को ही बंद करने की मांग भी कर डालते हैं. लाल-नीले-भगवे सभी सांसदों के ऐसे आचरण पर खेद व्यक्त करते हुए डा. योगेंद्र यादव कहते हैं, ‘पूरे संसद का इस विवाद पर एकमार्गी हो जाना दुर्भाग्यपूर्ण है.’

ऐसा नहीं है कि सभी दलित बुद्धिजीवी इस विवाद में एकरागी हो गये हैं. कुछ ने इस हंगामा में लिपटे बड़े खतरों को पहचानने की कोशिश की है. इस कार्टून पर हो रही राजनीति से उपजे खतरे पर दलित प्रश्नों पर गहराई से चिंतन करने वाले एस. आर. दारापुरी कहते हैं, ‘हंगामे से चुनावी राजनीति, जिस में वोट की राजनीति और प्राथमिकताएं ही निर्णय लेने की बाध्यताएं होती हैं, की बू आती है. यह हंगामा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहुत बड़ी चोट है. साथ ही इससे समाज में पहले से व्याप्त फासीवाद और कट्टरपंथ को और ताकत मिली है. इससे पहले हिन्दू और मुस्लिम कट्टरपंथी शिवाजी पर पुस्तक और सलमान रुश्दी की पुस्तक पर बवाल खड़ा कर उन्हें जब्त करवा चुके हैं. इसी प्रकार विभिन्न अवसरों पर सांस्कृतिक पुलिस लोगों पर कहर ढाती रही है.’

वो आगे आगाह करते हैं, ‘इतिहास गवाह है कि दलित बोलने की स्वतंत्रता से सबसे अधिक वंचित रहे हैं. अतः उनके लिए इस स्वतंत्रता को बनाये रखना सब से अधिक महत्वपूर्ण काम है. हाल में वाराणसी में बौद्ध पूर्णिमा पर घटी घटना दलितों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आसन्न खतरों का आभास कराता है. बीते 6 मई को वाराणसी में कचहरी स्थित डॉ. अम्बेद्कार की प्रतिमा पर बौद्ध जयंती का आयोजन किया गया था. वहां पर आयोजकों ने बुद्ध के साथ डॉ. आंबेडकर और पेरियार के चित्र भी लगाये थे. इनमें से डॉ. आंबेडकर के चित्र के नीचे ‘हम हिन्दू नहीं हैं’ और पेरियार के चित्र के नीचे ‘हिन्दू देवी देवताओं में विश्वास मत करो’ लिखा था. इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं था परन्तु इस पर भी हिन्दू वाहिनी के कुछ लोगों द्वारा आपत्ति की गयी और इस की शिकायत जिला प्रशासन से की गयी. इस पर जिला प्रशासन ने आयोजकों के विरोध को नजर अंदाज करते हुए वहां से उन दोनों चित्रों को हटवा दिया और तभी वहां पर बौद्ध जयंती का कार्यक्रम संपन्न हो सका. इस छोटी सी घटना से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दलितों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कितना बड़ा खतरा है. अतः इस अधिकार को बचाना सभी के लिए, खासकर दलितों के लिए, बल्कि बहुत महत्वपूर्ण है.’

इस विवाद के परिप्रेक्ष्य में एक बड़ा सवाल यह भी है कि कार्टून के बहाने उपजा यह हंगामा बताता क्या है? यह हंगामा बताता है कि देश-काल से कटकर आलोचना या कहें हंगामा करने की जो जिद्दी शुरुआत हो रही है, जिसमें अपने-अपने आइकन को लेकर एक तिल बराबर असहमति असहिष्णुता में बदल रही है, वो वैचारिक तौर खतरनाक है. हंगामा बताता है कि विपक्ष और सरकार दोनों की ही तर्कशक्ति तेजी से छीजती जा रही है और ये आने वाले पीढि़यों में भी इस जरूरी क्षमता का विकास नहीं होने देना चाहते हैं. यह हंगामा फिर यह हकीकत सामने लाता है कि लोकतंत्र में बहस की गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है, सांसदों में सहनशीलता खत्म होती जा रही है और सत्तासुख की असुरक्षा ने उनके दिमाग पर ताला जड़ दिया है. समाज विज्ञानी आशीष नंदी के अनुसार, ‘उक्त विवाद से प्रकट होता है कि हालांकि लोकतांत्रीकरण हुआ है लेकिन समाज में लोकतान्त्रिक मूल्यों का समावेश नहीं हुआ है. लोकतंत्र केवल चुनाव तंत्र बन कर रह गया है.’ यह हंगामा गवाह है कि संसद के अंदर गैर-जरुरी मामलों को तूल देकर उन्हें मुद्दा बनाया जा रहा है. या यूं कहें कि अलग-अलग आस्थाओं के नाम पर, इसकी आड़ में ये वास्तव में लोकतंत्र को ही और मजबूत नहीं होने देना चाहते हैं क्योंकि ऐसा हुआ तो फिर ऐसे नेताओं के लिए राजनीति करना असंभव हो जायेगा.

दूसरी ओर जिस तरह आज के नेताओं को लेकर कार्टून बन रहे हैं, कल को उनमें से कोई किसी बड़े तबके का आदर्श बन जाए तो मांग तो ये भी उठ सकती है कि कार्टूनिस्ट को जेल भेज दो. पूरे विवाद को देखकर अफसोस सांसदों की बौद्धिक निरक्षरता पर भी होता है कि वे क्यांे पहीं समझते कि आखिरकार तत्कालीन समय-समस्या-चुनौतियों को ही तो कार्टूनिस्ट अपनी रचना में समेटता है. हंगामा करने वालों की आंख खोलने के लिए यहां पटना के कार्टूनिस्ट पवन का जिक्र करना जरूरी हो जाता है. जिस लालू यादव को सवर्ण मानसिकता के लोग गंभीर-मिजाज का नहीं मानते, जिसे भारतीय मीडिया अक्सर मजाक का पात्र बनाता रहा है, ऐसे लालू यादव पर उनके दल के शासन काल में ही कार्टूनिस्ट पवन ने असंख्य कार्टून बनाये. और जब उन कार्टूनों पर पवन की पुस्तक का लोकार्पण तक लालू ने ही किया. (हालांकि लालू ने भी अम्बेडकर-कार्टून प्रकरण पर हंगामा करने वाले का ही साथ दिया है).

इस हंगामे में कुछ लोगों ने यह दिखाने कि कोशिश कि है कि वे डॉ. आंबेडकर और दलितों के बहुत बड़े हितैषी हैं. जहां तक जातीय या सामूहिक सम्मान के नजरिये से ही इस कार्टून को देखने की बात है तो कार्टून पर सवाल उठाने वाले दलित समुदाय के तथाकथित रहनुमाओं को यह भी याद रखना चाहिए कि दलित बुद्धिजीवी जिस तरह गैर दलित समाज के मिथकों, प्रतीकों, महापुरुषों की निंदा करते है उसके अनुपात में यह कार्टून कुछ भी नहीं है.

साथ ही आज नेहरू और बाबा साहब के नाम पर हंगामा करने वाले यह भूल गये कि जब कार्टून के प्रकाशन के समय इन दोनों नेताओं ने आपत्ति नहीं जताई थी तो आज वो ऐसा कर किस बुद्धिमानी और समझदारी का परिचय दे रहे हैं. आखिरकार वह कार्टून 1949 में एक बड़े राष्ट्रीय अखबार में छपा था, तब पंडित नेहरू और डॉ. अंबेडकर दोनों जीवित थे. डॉ. अंबेडकर के पोते प्रकाश अंबेडकर ने भी एक निजी चैनल को बातचीत में बताया है कि इस कार्टून पर उनके दादा ने कभी विरोध नहीं जताया था. गौरतलब यह भी है कि बाबा साहेब अंबेडकर ने कहा था कि पूजा भक्त को बर्बाद कर देती है. लेकिन अब अंबेडकर को ही पूजा जाने लगा है. बाबा के भक्तों ने पुणे में एनसीईआरटी के सलाहकार के दफ्तर पर हमला किया है.. ऐसा करके उन्होंने साबित कर दिया कि वो उस लोकतंत्र का सम्मान नहीं करते जिसका सपना बाबा साहब ने देखा था.

नेहरू और बाबा साहेब ने तब इस कारण हंगामा नहीं किया था क्योंकि वे समझते थे कि लोकतंत्र में आलोचना का अपना स्थान और जरूरत है. लेकिन आंखों में सत्ता की पट्टी बांधे हुए आज के ज्यादातर सांसद बौद्धिक दिवालियेपन के शिकार नजर आते हैं. इसे एनसीईआरटी के सलाहकार का पद छोड़ चुके राजनीतिशास्त्री योगेंद्र यादव के शब्दों में कुछ यूं समझा जा सकता है. उन्होंने इस्तीफा देते हुए कहा कि आने वाले पीढि़यों के प्रति लोकतांत्रिक समाज की कुछ जिम्मेवारियां होती हैं लेकिन आज-कल संसद में होने वाली गर्मागर्म और सूचनाओं से अच्छी तरह लैस नहीं रहने वाली बहसें इसको पूरा करने की दिशा में न्याय नहीं कर सकती हैं.

इस पूरे विवाद में एक और ऐतिहासिक तथ्य हंगामा करने वालों सांसदों और सरकार की समझदारी का उपहास उड़ाता है. उल्लेखनीय है कि पंडित नेहरू की कार्टूनिस्ट शंकर से अच्छी खासी मित्रता थी. नेहरू के मौत से सिर्फ 10 दिन पहले 17 मई, 1964 को शंकर का एक कार्टून प्रकाशित हुआ था. उसमें एक कमजोर और थके हुए नेहरू हाथ में मशाल लिए बस दौड़ पूरी करने वाले ही थे और गुलजारी लाल नंदा, लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई, कृष्ण मेनन और इंदिरा गांधी जैसे पार्टी नेता मशाल को लपकने के लिए तैयार खड़े थे. इस पर नेहरू ने मशहूर टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा था, ‘डोंट स्पेयर मी, शंकर (‘शंकर, मुझे भी मत बख्शना!) नेहरू की टिप्पणी का एक आशय यह भी था कि मुझे भी यूं ही आईना दिखाते रहा करो शंकर. ऐसी थी नेहरू की लोकतांत्रिक चेतना की ऊंचाई, कुछ ऐसा था नेहरू के मन में अभिव्यक्ति की आजादी के प्रति सम्मान. लेकिन आज उनकी ही पार्टी में यह गुण और मूल्य तली में चले गये हैं.

आज नेहरू, बाबा साहब और शंकर साहब की आत्मा कहीं होंगी तो वह सांसदों पर जरूर हंस रही होगी. साथ ही हाल के दिनों में कार्टून के नाम पर उठे विवादों को देखकर ऐसा लगता है कि हम सब इस वक्त कार्टून युग में जी रहे हैं और लोकतंत्र मजाक बना दिया गया है. कार्टून लोकतंत्र में ही स्वीकार्य होता है लेकिन भारत में फिलहाल कार्टून के जरिये लोकतंत्र को ही कमजोर करने की होड़ मची हुई हैं.

7 replies to “छद्म अंबेदकरवादियों का फासीवादी चेहरा

  1. मेरे विचार में पूजा केवल भक्तों को नहीं खराब करती, जिसकी पूजा करो, उसकी याद को भी खराब कर देती है. मानव को देवता या अवतार बनाने का अर्थ है कि उसके विचारों को भूल कर उनका सरलीकरण करके बस चिन्ह बना लो. अकसर वह चिन्ह उनके भक्त समय के साथ खोखला कर देते हैं. दलित विषय पर बात बात पर हल्ला या दँगा करने वाले लोग, बाबा साहब के विचारों को नहीं जानते, केवल उन्हें चिन्ह के रूप में जानते हैं. आलेख के लिए धन्यवाद.

  2. देखिए…हमारे संसद में कुछ भी संभव है. इस प्रकरण से पहले ही. एक छोटी सी खबर पढ़ थी, अखबार में. खबर थी-संसद में सांसद चर्चा में मश्गुल थे तभी एकाएक सदन में एक दुर्गंध फैल गई. इस मसले पे भी एक सांसद ने अध्यक्ष का ध्यान दिलाया. फिर सदन शाम तक के लिए स्थगित कर दी गई. संसद के सीवर लाईन में कुछ जाम हो गया था.
    खैर…इस खबर का ज़िक्र इसलिए यहां किया गया कि इसे मान के चलिए कि हमारे सांसद कल को कोई भी फैसला आमसमति से ले सकते हैं. और भविष्य में संसद ही देश की एक मात्र जगह होगी जहां कुछ भी संभव होगा.

    वैसे मनीष भाई ने एक बेहतर लेख लिखा है. लिखते रहिए.

  3. mainish ji, aapne baat to sahi uthai aur jin bindon ka aapne vistar diya hai, usse bhi sahmati hai lekin aap kya karenge aur kahenge ki apne desh me ambedkar jaise mahatvapurna rashtriya neta ko bhi in dino sirf dalit neta ki paridhi me bandh dene ki koshish me kuchh log lage huye hai. yah wahi samuh hai jinhe aap chhadma ambedkarwadi kah rahe hai. filhaal aapki sarthak tippani ke liye apko badhai…!

  4. Manish is absolutely correct. We should discard the so called Dalit intellectuals who are exploiting the poor and innocent people in the name of Dr Ambedkar and abusing the greate cartoonist Shankar. It is ridiculous, the Dalit social activist should come forward and condemn this kind of leaders.

  5. One of the best article, not only an eye opener for fools but a strengthening article for knowledgeable and wise persons.

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