गजाला जावेद

प्रकाश के रे बरगद के संपादक हैं.

करीब तीन साल पहले जब पकिस्तान के खैबर-पख्तूनख्वा ईलाके में तालिबानियों द्वारा गीत-संगीत पर पाबंदी की खबरें आ रही थीं, उन्हीं दिनों पकिस्तान से कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और छात्रों के कुछ प्रतिनिधिमंडल हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बीच दोस्ती और अमन बढ़ाने के उद्देश्य से हिन्दुस्तान आये थे जिनकी मेजबानी और सोहबत का मौका मुझे मिला था. उन लोगों में कुछ उसी ईलाके के बाशिंदे थे. तब मैंने उनसे इस बाबत जब पूछा तो उदासी भरे लहजे में उनका जवाब था कि जल्दी ही सब ठीक हो जायेगा. इस जवाब की उम्मीदी पर पेशावर के हालात का रंज हावी था. कुछ महीने बाद उनमें से एक का मेल आया जिसमें पख्तून ईलाके के कुछ गायक-गायिकाओं के पश्तो भाषा में गाये गाने थे और एक छोटा-सा नोट लिखा था कि हमने कहा था न कि हालात बदलेंगे. उन्हीं गानों में दो गाने गजाला जावेद के थे. फारसी से थोड़ा परिचय होने और हिन्दुस्तानी जानने के कारण उन गानों को थोड़ा समझ पाया लेकिन संगीत का असर बहुत हुआ. ‘बारान दे बारान ‘ (बारिश दे बारिश) को लगातार सुनते हुए पश्तो के मेरे पसंदीदा गायकों में मरहूम बख्त जमीना के साथ गजाला जावेद का नाम भी जुड़ गया. गीत-संगीत से जुड़े लोगों पर हमले और उनको लगातार दी जा रही धमकी के बारे में पता होने के बावजूद मुझे दूर-दूर तक अंदाजा नहीं था कि बख्त जमीना की तरह गजाला जावेद की आवाज भी हत्यारों की गोलियों के शोर का शिकार बन जायेगी.

कल शाम 18 जून को पेशावर में अज्ञात बंदूकधारियों ने गजाला जावेद और उनके पिता की हत्या कर दी. अभी हत्यारों की पहचान नहीं की जा सकी है लेकिन शक तालिबानियों पर किया जा रहा है, हालाँकि अभी तक किसी गिरोह ने इस हत्याकांड की जिम्मेवारी नहीं ली है. कुछ रपटों में कहा जा रहा है कि इसके पीछे गजाला के पूर्व पति का भी हाथ हो सकता है जिससे कुछ महीने पहले तलाक हो गया था. बहरहाल, असलियत का पता तो जांच के बाद लग सकेगा, और शायद कभी सच सामने न भी आये क्योंकि उस ईलाके में जांच होना और सही जांच होना भी एक असंभव-सी स्थिति है. जो भी हो, हत्यारों ने पाकिस्तान के और पश्तो के एक ऐसे कलाकार को इस दुनिया से मिटा दिया जिसकी आज बड़ी जरूरत न सिर्फ पख्तूनख्वा को, बल्कि इस पूरे खित्ते को थी.

गजाला उन पख्तून कलाकारों में से थीं जिन्होंने तालिबानियों द्वारा दायर अँधेरे को चिढ़ाते हुए गीत-संगीत की राह चुनी और एक पूरी पीढ़ी को प्रोत्साहित किया. और यह सब महज पिछले तीन साल की यात्रा थी. गजाला की तेजी से बढ़ी लोकप्रियता ने मुसर्रत और उरूज जैसी गायिकाओं तथा शाज खान जैसे गायकों को सामने आने का हौसला दिया. तालिबानियों के खिलाफ पाकिस्तानी सरकार की कोशिशों ने जैसे ही असर करना शुरू किया, वैसे ही स्थानीय टेलीविजन और रेडियो स्टेशनों ने गीत-संगीत के ढेरों कार्यक्रम प्रसारित करना शुरू कर दिया. बरसों के आतंकवाद, जातीय हिंसा और दमन से त्रस्त समाज को संगीत ने मरहम दिया. अफगानिस्तान में तालिबानियों के कब्जे से सालों पहले ही पकिस्तान के पख्तून ईलाकों में उनका असर था. इसी कहर से बचने के लिए पेशावर की मशहूर गायिका बख्त जमीना काबुल चली गयी थीं जहाँ वे खुद को मुजाहिद्दीन कहने वाले अमरीका-परस्त भाड़े के लड़कों के खिलाफ गीत गाती थीं. इसी वजह से अस्सी के दशक में काबुल में उनकी हत्या कर दी गयी थी. पाकिस्तानी पख्तून ईलाके में तालिबानियों ने स्वात घाटी की मशहूर कलाकार शबाना की हत्या कर उनकी लाश कुख्यात ‘बूचड़ चौक’ पर सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शित किया था ताकि लोग उनके फरमानों से डरें. इसी के साथ हमलों और धमकियों का लगातार सिलसिला चलता रहा. इस कारण अनेक कलाकार या तो ईलाके से बाहर पलायन कर गए या गीत-संगीत करना बंद कर दिया था. स्थिति बेहतर होने का मतलब यह नहीं था कि तालिबानियों या उनके असर से अब खतरा नहीं था. पिछले ही साल पेशावर में उभरती हुई गायिका ऐमन उदास को उनके भाईयों ने ही गोलियों से भून डाला. उल्लेखनीय है कि यह ईलाका मजहबी कट्टरपंथ का गढ़ होने के साथ घोर सामन्तवादी मूल्यों का समाज भी है जहाँ औरतों को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है. ऐसे में ढेर सारी महिला कलाकारों का हिम्मत कर गीत-संगीत को चुनना एक बड़ा विद्रोही कदम है. इस पृष्ठभूमि में गजाला जावेद जैसी कलाकारों की मौजूदगी इंसानियत के बेहतरी के चिर-पुरातन सपने के प्रति भरोसे को और मजबूत करती है.

गजाला तो चली गयी लेकिन उसके गीत हमारे साथ हमेशा रहेंगे और उसकी हस्ती कलाकारों को आगे बढ़ते रहने का हौसला देती रहेगी. पेशावर को, पकिस्तान को और पूरी दुनिया को आज गजाला की रूह के चैन के लिए दुआ करने की जरूरत नहीं है. जरूरत तो उस दुआ को दिल से दुहराने की है जिसे गजाला ने एक गीत में गाया था.

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