एफडीआई पर सरकार झूठ बोल रही है: सच्‍चर

दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश राजिंदर सच्चर विभिन्न जनांदोलनों से जुड़े हैं.

जस्टिस राजिंदर सच्‍चर

भारत में रीटेल कारोबार अनुमानत: 400 अरब डॉलर का है लेकिन इसमें कॉरपोरेट हिस्सेदारी सिर्फ पांच फीसदी है। भारत में रेहड़ी-पटरी लगाने वालों को जोड़ लें तो कुल पांच करोड़ खुदरा विक्रेता हैं। इसका मतलब यह हुआ कि एक रीटेलर आठ भारतीयों की सेवा में है। चीन में यह संख्या 100 चीनियों पर एक की है। फिक्की की दी हुर्इ सूचना के मुताबिक रीटेल कारोबार में खाने-पीने का हिस्सा 63 फीसदी है।

सरकार का यह दावा कि वालमार्ट जैसी कंपनियों के आने से छोटे दुकानदारों की दुकानें बंद नहीं होंगी, जान-बूझ कर दिया गया गलत बयान है। अमेरिका की आयोवा स्टेट युनिवर्सिटी का अध्ययन दिखाता है कि आयोवा में वालमार्ट के आने के शुरुआती एक दशक में यहां 555 गल्ले की दुकानें, 298 हार्डवेयर की दुकानें, 293 निर्माण सामग्री बेचने वाली दुकानें, 161 अलग-अलग किस्‍म के सामान बेचने वाली दुकानें, 158 महिला परिधान की दुकानें, 153 जूते की दुकानें, 116 दवा की दुकानें और 111 पुरुष वस्त्र की दुकानें बंद हो गर्इं। भारत में, जहां छोटे दुकानदारों द्वारा प्रतिरोध करने की क्षमता और कम है, इससे कुछ भी अलग क्यों होगा?
तथ्य यह है कि बाज़ार में वालमार्ट के आने के 15 वर्षों के दौरान 31 सुपरमार्केट श्रृंखलाएं दिवालिया हो गर्इं। वालमार्ट के 16 लाख कर्मचारियों में सिर्फ 1.2 फीसदी ही गरीबी रेखा से ऊपर जीते हैं। अमेरिकी ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स कहता है कि एक परिवार के साप्ताहिक खरीद के आंकड़ों को देखें तो वालमार्ट की कीमतें दूसरों के मुकाबले कम नहीं हैं।
थाइलैंड में सुपरमार्केट के चलते पड़ोस की पारंपरिक दुकानों में 14 फीसदी की कमी सिर्फ शुरुआती चार साल के भीतर आ गर्इ। भारत में बेंगलुरु, अहमदाबाद और चंडीगढ़ के 33-60 फीसदी सब्ज़ी और फल विक्रेताओं ने ग्राहकों की संख्या में 15-30 फीसदी कमी, बिक्री में 10-30 फीसदी की कमी और आय में 20-30 फीसदी कमी की बात कही है, जिनमें सबसे ज्यादा असर बेंगलुरु में देखा गया है जहां देश के सबसे ज्यादा सुपमार्केट मौजूद हैं।

अमेरिका में वालमार्ट की दुकानों का औसत आकार 10,800 वर्ग फुट है जिनमें सिर्फ 225 लोग नौकरी करते हैं। इस लिहाज से देखें तो रोज़गार पैदा होने का सरकारी दावा धोखा नहीं लगता?

सरकार ने अपनी आलोचना को नरम करने के लिए इस बात पर जोर दिया है कि वालमार्ट को 100 मिलियन डॉलर तक के निवेश पर सिर्फ 51 फीसदी हिस्सेदारी दी जाएगी। एकबारगी तो यह बात आकर्षक जान पड़ती है लेकिन क्या वालमार्ट का प्रबंधन इतना मूर्ख है कि जब उसका मौजूदा रीटेल कारोबार 400 अरब डॉलर हो तो वह इतने से संतोष कर लेगा? ज़ाहिर है, ऐसा नहीं होगा। वालमार्ट दरअसल एक तम्बू में सिर घुसाने वाले ऊंट की चाल चल रहा है जो बाद में उसमें बैठे लोगों को भगाकर तम्बू पर कब्ज़ा कर लेता है। आप ऊंट की जगह वालमार्ट को रख कर देखिए कि हमारे करोड़ों खुदरा दुकानदारों के सामने कितना भयानक खतरा है।
सरकार बार-बार जो दलील दे रही है कि वालमार्ट को भारत में कारोबार लगाने देने से कीमतें कम होंगी और रोज़गार बढ़ेंगे, यह अब तक दुनिया में कहीं भी साबित नहीं हुआ है। अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की एक कमेटी की 2004 में आर्इ रिपोर्ट कहती है कि ”वालमार्ट की कामयाबी से वेतन-भत्तों पर दबाव पड़ा है, कामगारों के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन हुआ है और देश भर में समुदायों के जीने के तौर-तरीके को खतरा पैदा हुआ है। आखिर किस तर्क से सरकार यह कहती है कि भारत में इसका असर उलटा होगा? इसकी सिर्फ एक वजह है और वो यह कि सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मदद पहुंचाने के लिए जान-बूझ कर झूठ बोल रही है।
ब्रिटेन की टेस्को के काम करने के तरीकों को देखें तो उपभोक्ताओं पर ऐसा ही प्रतिकूल असर पड़ा है।
संडे टाइम्स ने एक अध्ययन किया था जो दिखाता है कि ब्रिटेन के 108 तटीय क्षेत्रों यानी देश के 7.4 फीसदी हिस्से में खाद्य बाजार पर टेस्को का पूरा नियंत्रण है। लंदन के इम्पीरियल कॉलेज में सेंटर फॉर फूड चेन रिसर्च में एग्री बिज़नेस के प्रोफेसर डेविड होग्स के मुताबिक वालमार्ट और टेस्को जैसे सुपरमार्केटों की बाध्यता है कि वे अपने मूल क्षेत्र यानी अमेरिका और ब्रिटेन से कारोबार को बाहर ले जाएं क्योंकि उनके अपने बाज़ार अब परिपक्व हो चुके हैं इसलिए वे ज्यादा आबादी और कम सुपरमार्केट वाले देशों की खोज में हैं, क्योंकि उनके पास और कोर्इ रास्ता है नहीं जबकि उनके अपने देश का बाज़ार भर चुका है। इसी तरह मिशिगन स्टेट युनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर का मानना है कि विकासशील देश के उन किसानों के लिए रीटेल क्रांति गंभीर खतरे पैदा करती है जो पारंपरिक रूप से स्थानीय हाट-बाजार के आपूर्तिकर्ता रहे हैं।

थाइलैंड में टेस्को के सुपरमार्केट का आधे से ज्यादा खुदरा बाज़ार पर कब्ज़ा है। टेस्को जब थाइलैंड में आया था तो इसने स्थानीय लोगों से रोजगार का वादा किया था लेकिन अब इस पर खुले तौर पर लोग गलत तरीके से व्यापार करने और स्थानीय कारोबारियों से उलझने के आरोप लगाते हैं। जहां तक यह दावा है कि ये सुपरमार्केट स्थानीय उत्पादकों से खरीदेंगे, इसका झूठ तब पकड़ा गया जब टेस्को के खिलाफ जुलार्इ 2002 में दर्ज एक मुकदमे में कोर्ट ने पाया कि टेस्को उत्पादकों के उत्पाद ले जाने के लिए स्लॉटिंग शुल्क लेती है और आपूर्तिकर्ताओं से प्रवेश शुल्क लेती है। बैंकॉक में चार साल पहले खुले टेस्को के स्टोर के कारण स्थानीय गल्ले की दुकानों की बिक्री आधे से भी कम रह गई है।

मलयेशिया में टेस्को 2002 में गर्इ थी। जनवरी 2004 में पाया गया कि टेस्को से काफी नुकसान हुआ है इसलिए सरकार ने तभी से किसी भी नए सुपरमार्केट के निर्माण पर तीन प्रमुख शहरों में रोक लगा दी।

यह जानना दिलचस्प होगा कि वालमार्ट जो कुछ बेचती है, उसका 92 फीसदी चीनी कंपनियों से आता है। भारत का बाज़ार पहले ही चीन के सस्ते माल से पटा पड़ा है और हमारे व्यापारी चीन द्वारा अपनाए जा रहे गलत श्रम नियमों पर चीख-चिल्ला रहे हैं। भारत सरकार पूरी ईमानदारी से एक बार बताए कि क्या वह अब भी विदेशी उद्यमों के लिए खुदरा बाज़ार को खोल कर हमारे देश के करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी छीनने को तैयार है?

जनपथ से साभार

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