ऐसी क्या मजबूरी और जल्दी थी अनुराग !

इतिहासकार, पत्रकार और कवि डॉ दुष्यंत साहित्य के साथ-साथ सिनेमा में गहरी रूचि रखते हैं. उनसे dr.dushyant[at]gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

दुष्यंत
फिल्म का एक दृश्य

अनुराग कश्यप निर्माता की भूमिका में हैं और आखिर के रोलिंग क्रेडिट में एक स्थिर चित्र में रानी मुखर्जी के साथ बैठे हैं, यह बॉलीवुड की दो धाराओं का मिलना है। मजाक में कह सकते हैं कि रानी के साथ तस्वीर के लिए क्या अनुराग ने इतने पैसे लगा दिए। जाहिर है कि अईय्या अनुराग की फिल्म है भी और नहीं भी। एक मराठी मध्यमवर्गीय परिवार की लडकी की कहानी है, जिसमें उसके ख्वाब वैसे ही हैं कि कोई राजकुमार आएगा और उसे घोड़े पर बिठा कर ले जाएगा। माता पिता भाई और दादी के साथ रहने वाली मीनाक्षी प्रेम करके विवाह करना चाहती है। उस फेंटेसी की दुनिया में वह मासूम भी है, नटखट भी। उसके लिए ही सारी कहानी बुनी गई है, दक्षिण के सितारे पृथ्वीराज सुकुमारन को यहां बहुत काम नहीं है, ऐसा सोच कर ही किया गया होगा, बिना सोचे तो वैसे भी पर्दे पर कुछ नहीं होता, अपनी शानदार मराठी फिल्मों के बाद अपनी पहली हिंदी लेकर आए प्रतिभाशाली निर्देशक सचिन कुंडलकर कुछ जमीनी सचाइयों को दिखाने की कोशिश करते हैं, वह उनकी ताकत है पर उस ताकत को पूरी फिल्म में मेंटेन कर लिया जाता तो महान और मौलिक फिल्म बन जाती। क्या यह संभव है ऐसा ना बनाना योजना में शामिल हो? पर योजना के मुताबिक तो यह भी नहीं लगता कि निर्देशक कहीं विचलित से हो गए हैं, और विचलित होने का यह अवसर निर्माता के रूप में अनुराग ने उन्हें दे कैसे दिया, सोचना चाहिए। प्राय: कस्बाई लडकियों की इस फेंटेसी और किसी सपनों के राजकुमार की इच्छा और उम्मीद को जिस तरह रचा है वह तो ठीक ही बन पडा है पर कॉमेडी के साथ संगीतमय सिनेमा बनाने का प्रयास अनुराग के रियलिस्टिक तेवर के साथ मिलकर एक घालमेल सा हो गया है। हैरानी इस रूप में होती है कि आम जीवन में गरीब से गरीब परिवार भी बारात आने के रास्ते में कचरे का पात्र नहीं रखता, एक दिन के लिए ही सही हटाएगा जरूर। बहुत कम संवाद पृथ्वीराज को दिए गए हैं, उसकी आंखों और भंगिमाओं को ही तीन चौथाई फिल्म में कथा कहने में इस्तेमाल किया गया है।

अपने यह दिमाग से निकाल कर जाएं कि अनुराग की फिल्म देखने जा रहे हैं..मराठी परिवार के साथ तमिल परिवार की ब्लेंडिंग बॉलीवुड के पैन इंडियन भाव या मार्केट की जरूरतों के लिहाज से देखी जानी चाहिए। कुछ मेटाफर भी हमें दिखते हैं हालाकि वे अमूर्त ही ज्यादा रहे। नायिका की सहकर्मी मैना लेडी गागा का अजीब सा अवतार है, नायक चित्रकार है और थ्रिलर की तरह उसका परिचय हमारे सामने खुलता है। कहानी कहने का यह तरीका बहुत आश्वस्त तो नहीं करता है, ग्रे शेडेड कहानी अनुराग की फिल्मों में होती है पर कहानी कहने की शैली तो ऐसी होती ही है कि बात ठीक तरीके से पहुंच जाए, यहां कहानी एकरेखीय होते हुए भी ट्रीटमेंट में बिखर जाती है।

अनुराग कश्यप

तारीफ करना बनता है कि रानी का काम कई शेड्स लिए हुए है। तमिल जहां बुलवाई गई है, सबटाइटल्स दे दिए जाते तो क्या कोई नुकसान हो सकता था, यह समझ में नहीं आता। हां, अब नुकसान जरूर लगता है कि जिसे फिल्म पसंद नहीं आएगी एक कमी यह भी गिनवा देगा। अच्छे लिखे और बने हुए गाने कितने याद रह पाएंगे, फिल्म को मदद कर पाएंगे कहना मुश्किल है।

और, लास्ट बट नॉट लीस्ट, सचिन कुंडलकर से एक बात – भईय्या ! आपसे उम्मीदें बहुत हैं, ‘अईय्या’ जैसी फिल्मों से उन पर पानी मत फेरिए।

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