‘…और हम बुलेट के मालिक हो गए’ (भाग- दो)

सुशील झा बी बी सी में कार्यरत हैं. उनकी शिक्षा जादूगोड़ा (झारखण्ड), जे एन यू और IIMC, दिल्ली में हुई. उनसे sushilkumar.jha@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

इस आलेख का पहला भाग पढ़ने के लिए क्लिक करें: ‘…और हम बुलेट के मालिक हो गए’ 

सुशील झा

हाथों की चंद लकीरों का ये खेल है बस तकदीरों का….फिल्म थी विधाता..छुटपन में बड़े पर्दे पर देखी थी तब से हाथ की लकीरें यदा कदा देखता था और सोचता था कि अपनी तकदीर में भी कुछ है या नहीं. तब एक ख्वाहिश थी…बड़े होंगे तो इतना पैसा होगा कि बुलेट खरीद लें.

पिताजी के पास एक साइकिल थी जो सेकंड हैंड खरीदी गई थी. हाफ पैडल साइकिल चलाते और सोचते…. साला एक दिन बुलेट पर बैठेंगे. फिर एक दिन किसी ने बताया कि जो क्लास में फर्स्ट आता है वो बड़ा आदमी बनता है. उस दिन से क्लास में फर्स्ट आने लगे थे.

पापा हर साल वादा करते. फर्स्ट आओगे तो साइकिल खरीद दूंगा. हर बार फर्स्ट आते लेकिन एक मसाला डोसा और एक कोका कोला..छह रुपए. इतने में हम खुश हो जाते. पापा को हम आज भी नहीं बता पाए कि हम वो साइकिल मिस करते हैं जिसका आपने वादा किया था.

वैसे भी पूरे होने वाले वादे याद कहां रहते हैं.

लेकिन मैंने अपने आप से वादा किया था. पहली गाड़ी बुलेट ही होगी. हुई भी…काली…झक काली…एकदम वैसी ही आवाज़, जिसे सुनकर नशा सा छाने लगे.

पहली मोहब्बत का नशा भी उतना नहीं चढ़ा होगा जो अपनी बुलेट की पहली किक में आया था. साली एक किक में स्टार्ट. भड़ भड़ भड़. बैठे तो लगा राजा हैं. चले तो लगा सिकंदर हैं और गाड़ी दौड़ी तो लगा कि अगर भगवान भी होते तो बुलेट ही चलाते. अपने पैसे की. खरीद कर.

वजन करीब 352 किलो. सीट पर बैठे बैठे बुलेट को स्टैंड पर लगाने की कला पिंगुआ ने सिखाई. बोला टेकनीक है हम बोले दुबले हैं ताकत नहीं है. पिंगुआ ने गुरु मंत्र दिया- बुलेट दिमाग से चलता है देह से नहीं. हमारा वजन 52 किलो. हम 352 किलो की बुलेट चलाते हैं तो लोग देखते हैं. कोई कहता है बुलेट हमें चलाती है. कोई कहता है हम बुलेट चलाते हैं. दोनों गलत है. न हमें बुलेट चलाती है न हम बुलेट चलाते हैं. कुछ है जो चलता है. देखने वालों को अपने हिसाब से दिखता है.

मैं और मेरी बुलेट अक्सर ये बातें करते हैं और लोगों पर हंसते हैं. हम जानते हैं हवा से बात करने का मुहावरा पुराना हो चुका है. हम एक दूसरे से बात करते हैं और कहते हैं कि अगर हवा न होती तो होते मैं तुम और हमारी तन्हाई.

शांति पथ की चिकनी सड़क पर चालीस की रफ्तार में मेरी बुलेट मुझे दर्शन का पाठ पढ़ाती है. सुबह सोकर उठने से लेकर रात में सोने तक कभी पत्नी के साथ, कभी बच्चों के साथ, कभी बॉस के साथ और कभी ऑफिस के साथ होता हूं. लेकिन बीच के कुछ मिनट मैं सिर्फ अपने साथ होता हूं या कहिए कि बुलेट के साथ होता हूं.

बुलेट जीता है बात करता है मुझसे. चाहे जितना भी नाराज़ होऊं. भड़ भड़ भड़ भड़ सुनते ही मुस्कुरा क्यों उठता हूं आज तक इसका जवाब खोज नहीं पाया.

शायद कभी खोज भी नहीं पाऊंगा. या कहिए खोजना भी नहीं चाहता. वो जवाब नहीं है वो मेरे दिल का एक कोना है जो मैं बुलेट में छोड़ जाता हूं. उस पर बैठता हूं तो शायद पूरा हो पाता हूं.

One reply to “‘…और हम बुलेट के मालिक हो गए’ (भाग- दो)

  1. न हमें बुलेट चलाती है न हम बुलेट चलाते हैं. कुछ है जो चलता है. देखने वालों को अपने हिसाब से दिखता है. wah wah

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