यादों में कुंभ

सुशील झा बी बी सी में कार्यरत हैं. उनकी शिक्षा जादूगोड़ा (झारखण्ड), जे एन यू और IIMC, दिल्ली में हुई. उनसे sushilkumar.jha@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

सुशील झा
सुशील झा

शायद लिख देना चाहिए वर्ना यादों की परतों में यादें कहीं दब कर फिर भूल बिसर जाती हैं. धूल, धूनी, थकान, भगवा रंग और दो तरह का पानी मिलता हुआ जिसे लोग संगम कह रहे थे. जब सोचता हूं तो यही याद आता है.

ये वो छवि है जो छह साल पहले की है. ठंड में ठिठुरते हुए सोना और सुबह से शाम बस चक्कर लगाते रहना. रिपोर्टों का दबाव नहीं लेकिन कहानियां बस मानो आपको खोज रही हों.

जाना भी तय नहीं था. आखिरी मौके पर किसी रिपोर्टर ने कहा था कौन जाएगा उस गंदे पानी में स्नान देखने (माशाल्लाह वो रिपोर्टर किसी बड़े अख़बार में हैं इस समय). मैंने कहा मैं चला जाता हूं अगर कोई नहीं तैयार है तो. कई बार कुंभ में जाना अपने आपको सेकुलर साबित करने की होड़ में आड़े भी आता है. मेरे साथ ऐसी कोई समस्या नहीं थी. साबित ही करना था तो अपने को एक अच्छा रिपोर्टर और देखना था कुंभ.

धम्मं शरणं गच्छामि

चित्र: सुशील झा
चित्र: सुशील झा

मेरे लिए धर्म यही है कि धर्म तब तक ही ठीक है जब तक उससे किसी और को परेशानी न हो..एक परिभाषा ये भी अच्छी लगती है कि धर्म वो जो बचने और बढ़ने में मदद करे. इलाहाबाद में किसी को नहीं जानता था. ज़रुरत ही नहीं पड़ी. कुंभ में सबकुछ यूं ही होता है.

उन दिनों Paul Brunton की किताब A search in secret India पढ़ी थी और आध्यात्मिक लोगों से मिलने का मन भी था. घूमता रहा. रिपोर्ट करने का दबाव नहीं था. जूना अखाड़ा से लेकर निर्वाणी अखाड़ा और निरंजनी से लेकर बैरागी अखाड़ा सब गडमगड हो गया था.

बाबा ही बाबा. साधु ही साधु. एक जादुई, अबूझ दुनिया जहां एक ही पल में कोई महात्मा लगे तो दूसरे ही पल में ढोंगी. पहचानना कोई बहुत मुश्किल नहीं होता है ढोंगी का पाखंड पता चल ही जाता है.

ज्ञान ही पूछौ साधु की

जर्मन साधु आनंद गिरि ने जब कहा कि हिंदू धर्म कुछ नहीं है तो माथा ठनका था. वो बोले आप बाहर खड़े रहिए मैं आता हूं. गुरु के सामने बात करना उचित नहीं था.

छोटा कद, दुबले पतले आनंद गिरि कई बरसों से साधु हो गए थे. बोले बीबीसी सुनता हूं आपकी आवाज़ सुनी है पहले. मैंने कहा वो तो ठीक है लेकिन धर्म की आपकी व्याख्या बताइए.

आनंद मुस्कुराए थे और बोले हम सब सनातन धर्म को मानते हैं. हिंदू धर्म जैसा कुछ नहीं है. सिंधु और हिंदू का मसला तो आप जानते ही हैं. मार्के की बात थी. टेक्नीकली भी सही बात है ये.

खैर साधु क्यों बने ये वाहियात सवाल मैं किसी साधु से नहीं करता..मुझे पता है हर किसी के अपने कारण होते हैं और पहली मुलाक़ात में कोई इतनी गंभीर बात नहीं बताता.

मैंने आनंद गिरी से रामपुरी बाबा (अमरीकी नागरिक जो अब जूना अखाड़ा के बड़े साधु हैं) की किताब के बारे में बातचीत शुरु की तो आनंद ने कहा कि किताब तो अच्छी है लेकिन lot of answers are not there.

चित्र: सुशील झा
चित्र: सुशील झा

मैंने पूछा कौन से तो आनंद का जवाब एकदम सहज और सच्चाई से भरा हुआ लगा. उनका कहना था कि साधुओं को सबसे अधिक जूझना पड़ता है अपनी काम पिपासा को साधना. वो सबसे कठिन तप होता है और रामपुरी जी ने अपनी किताब में इसका कहीं ज़िक्र नहीं किया है.

सत्य है तथ्य है. आम आदमी भी बाबा लोगों के बारे में यही जानना चाहते हैं कि वो इस चाहत पर कैसे नियंत्रण करते हैं कैसे साध लेते हैं शरीर की एक आमूल चूल ज़रुरत को.

इसका जवाब अभी तक नहीं मिला है. हो सकता है सवाल बचकाना हो और कई लोग अपने अपने स्तर पर गांधी की तरह सेक्स को भी साध चुके हों. हमारे घरों में इस विषय पर इतनी कम बात होती है कि डायरी लिखते समय भी संकोच हो रहा है.

खैर उसके बाद आनंद गिरी से दिल्ली में भी एक मुलाक़ात हुई. उन्होंने आग्रह किया था कि मैं उनको एक रेडियो दूं. मैंने वादा भी किया था लेकिन दिल्ली में रेडियो मिल नहीं पाया. आनंद गिरी साइकिल से जर्मनी जा रहे थे. पाकिस्तान ईरान होते हुए. इस बार आनंद गिरी से मुलाकात नहीं हुई.

अलबत्ता रामपुरी जी से मिला. लेकिन सेक्स वाला सवाल पूछ नहीं पाया. कई लोग और साधु भी थे. लेकिन रामपुरी जी ने कहा कि आप बाद में आइए तो लंबी बात होगी.

कई और साधुओं से मिला था. कोई लठ्ठ वाला साधु तो कोई हाथ खड़ा रखने वाला साधु. एक साधु जी तो कीलों के झूले पर बैठे थे लेकिन उनकी शक्ल ही थी फ्रॉड जैसी और पता चल रहा था कि मीडिया को लुभाने के लिए ये काम कर रहे हैं. कीलें भी कोई तीखी न थीं. मोटी मोटी फिर भी भीड़ तो हो ही जाती है तमाशा देखने वालों की.

कुछ कुछ होता है

चित्र: सुशील झा
चित्र: सुशील झा

तीन चार डॉक्यूमेंट्री बनाने वाले भी मिले. कोई अर्जेंटीना से आया था कोई मेक्सिको से. सबको कुंभ में कुछ न कुछ महसूस हो रहा था. आयरलैंड की एक महिला अपने पति की चिता की राख गंगा में बहाने आई थीं. नहीं वो हिंदू नहीं थीं. आयरिश थीं. उन्हें लगा कि राख को गंगा जैसी पवित्र नदी में बहाने से अच्छी श्रद्धांजलि कुछ और नहीं हो सकती.

गंगा में कुछ बात तो है. वैज्ञानिक भी मानते हैं कि इसके पानी में कुछ तत्व हैं जो बाकी नदियों की अपेक्षा इसकी गुणवत्ता बेहतर रखते हैं. नदियों की पवित्रता सिर्फ भारत में नहीं है. इस्लाम में भी आबे जमजम किसी नदी का ही पानी होता होगा. जॉर्डन नदी की पवित्रता के बारे में भी बहुत सुना है. लेकिन यहां तो गंगा को पवित्र मानने वाले सेकुलर जमात से बाहर ही हो जाते हैं.

छह साल बाद…

2013 में भी दफ्तर से कुंभ का कार्यक्रम बन चुका था और इसमें मेरा नाम नहीं था लेकिन कहीं न कहीं मुझे लग रहा था कि मेरा जाना होगा.

चित्र: सुशील झा
चित्र: सुशील झा

कुछ संयोग माना जाए कि मीटिंग में मैंने कहा कि इस इवेंट को फेसबुक और ट्विटर के ज़रिए लोगों तक पहुंचाया जाए तो बेहतर होगा. सलाह मान ली गई और हम फिर एक बार पहुंच गए कुंभ.

इस बार न बाबाओं से मिलना था और न ही कोई ज्ञान प्राप्त करना था. इस बार कुंभ को महसूस करना था. घूमते टहलते…रिपोर्टें करते करते कुंभ की खूशबू दिलो दिमाग में बसी.

कहते हैं युवा लोग अधिक आ रहे हैं कुंभ …हां मैंने भी देखा..युवा लोग हैं लेकिन सिर्फ अपने मोबाइल कैमरों से फोटो खींचने..और एक उत्सुकता में आए हैं..न उन्हें स्नान करना है और न ही कोई धर्म का काम करना है. कुछ हो रहा है उसमें शामिल होना है.

जो कुंभ नहीं गए हैं कभी…उन्हें लगता है कि ये एक मेला है. सच पूछिए तो ये बस एक स्नान भर है..आइए नहाइए और वापस जाइए…अपने घरों के बाहर कचरा फेंकने वाले गंगा में स्नान को लेकर इतने धार्मिक कैसे हो जाते हैं समझ नहीं आता. और ये भी समझ से परे है कि नहा लेने से पाप कैसे खत्म हो सकते हैं.

फिर याद आया..धर्म सोचने की चीज़ होती भी नहीं है. एक जत्था था विदेशियों का..शाम के समय संगम पर डूबते सूरज को देखता…मैंने पूछा..यहां तो सब संगम में स्नान के लिए आते हैं..जवाब मिला- हम संगम में डूबता सूरज देखने आए हैं…it is so pure….

कुछ याद रहेगा…

कुंभ से लौट कर मैंने सोचना शुरु किया तो पाया कि यादों में सूरज बचा रह गया….संगम में डूबता…वो औरत बची रह गई जो शाही स्नान के दिन सूरज को अर्घ्य दे रही थी..वो हरियाणवी दाढ़ी वाला बूढ़ा भी याद रह गया जो मुस्कुराते हुए फोटो खिंचवा रहा था. वो बच्ची भी याद रही जो ठंड में अपनी मां के भीगे आंचल को ही लपेट रही थी.

वो फूल और अगरबत्ती का दोना भी याद रह गया और टीका लगाते पंडित भी जो बिजनेस मंदा होने की शिकायत कर रहे थे. एक झटके में कभी कभी नागा साधु गुज़रते हैं लेकिन याद नहीं रह पाते…

चित्र: सुशील झा
चित्र: सुशील झा

कुंभ की रेत याद है…कुंभ का पानी भी याद है….उस पर रात में झिलमिल करती रोशनी याद रह जाती है….कुंभ की महक याद रह जाती है..

मौनी अमावस्या में अधिक भीड़ होगी…अधिक विदेशी भी आएंगे..फिर शाही स्नान होगा…फिर नागा आएंगे..मीडिया वाले भी पहुंचेंगे लेकिन क्या मीडिया को नागा साधु से इतर कुंभ दिख पाएगा…क्या वो स्नान करके धुलने वाला पाप टीवी की स्क्रीनों पर दिखेगा…क्या वो महक दिखेगी…और वो रेत-गर्द-गीली मिट्टी और पैरों की थकान दिख पाएगी सेटेलाइट के टावरों से…

वो नहीं दिखेगी…..क्योंकि वो असल है जो महसूस किया जा सकता है..जो hyper-reality है वो ही दिखेगी अखबारों-टीवी-फेसबुक पर…इसलिए अगर कुंभ को महसूस करना हो…जानना हो कि आखिर भारत कहां रहता है…वो क्या सोचता है..वो क्यों ऐसा करता है…तो कुंभ जाना चाहिए….कुंभ क्या ऐसे हर मौके पर जाना चाहिए जहां अभी भी कुछ बचा हुआ है…सहेजा हुआ है….संगम या गंगा में स्नान करना धर्म का हिस्सा नहीं है ये रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा है एक संस्कृति का हिस्सा है और इस संस्कृति को भी जानना उतना ही ज़रुरी है जितना अपने आप को जानना.

(कुंभ से लौटने के बाद डायरी का के कुछ अन्य पन्ने)

सुशील झा की कुम्भ डायरी का पहला पन्ना यहाँ देखें।

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