नीदो तानिया के बहाने

उदय प्रकाश

उदय प्रकाश। मशहूर कवि, कथाकार, पत्रकार और फिल्मकार। कई कृतियों के अंग्रेजी, जर्मन, जापानी एवं अन्य अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध। लगभग समस्त भारतीय भाषाओं में रचनाएं अनूदित। ‘उपरांत’ और ‘मोहन दास’ के नाम से इनकी कहानियों पर फीचर फिल्में भी बन चुकी हैं। उनसे udayprakash05@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

नीदो तानिया सिर्फ़ उन्नीस साल का, दुबला-पतला लड़का था. एक निजी प्रोफ़ेशनल युनिवर्सिटी में फ़र्स्ट इयर का छात्र. उसके सामने अभी उसका एक लंबा कैरियर और वर्षों का भविष्य बाकी था, जिसे २९ जनवरी को अचानक, दिल्ली के व्यावसायिक बाज़ार लाजपतनगर में, आठ दूकानदारों द्वारा पीट-पीट कर खत्म कर दिया गया. उसकी हत्या करने वालों में दो हत्यारे नाबालिग थे, ठीक उसी तरह, जैसे निर्भया बस बलात्कार कांड का सबसे जघन्य बलात्कारी भी नाबालिग था. स्पष्ट है कि जब तक मौज़ूदा कानूनों में संशोधन नहीं किये जाते, तब तक उसे हत्या की सज़ा नहीं दी जा सकेगी। निर्भया बस-बलात्कार कांड के ‘नाबालिग’ दोषी को भी सिर्फ़ बाल-सुधारगृह में तीन साल के लिए भेजा गया है।  अभी हमारी न्याय-प्रणाली इस नये, बदले हुए सामाजिक यथार्थ को समझ नहीं पा रही है, जिसमें बच्चे अब नाबालिग नहीं, ‘वयस्क’ हो चुके हैं।  वे बलात्कार, चोरी, डकैती, लूट और हत्याएं करने लगे हैं।  पिछले दिनों दिल्ली की सबसे बड़ी, सात करोड़ रुपयों से अधिक की  लूट का ‘मास्टर माइंड’ एक नाबालिग ही था.

नीदो तानिया की पांच गलतियां थीं. पहली यह कि उसने अपने बाल आजकल के युवाओं की तरह ‘कलर’ (रंगीन) कर रखे थे. दूसरी गलती यह कि वह दिल्ली की एक पनीर की दूकान में, पनीर या क्रीम-मक्खन खरीदने नहीं, अपने किसी दोस्त का पता पूछने गया था. यानी, वह ‘कस्टमर’ नहीं था. एक मशहूर ग़ज़ल के एक शेर को याद करें तो – वह ‘बाज़ार से गुज़रा तो था, लेकिन खरीददार नहीं था.’ अब हमारे महानगर इसी तरह हो गये हैं. यहां हर कोई या तो कुछ बेचता है, या खरीदता है. यानी, शहर अब एक बड़ा-सा शापिंग माल है.

नीदो तानिया की तीसरी गलती यह थी कि वह उस अरुणाचल प्रदेश का था, जो उत्तर-पूर्व में है, जहां रहने वालों के चेहरे-मोहरे दिल्ली और उत्तर-भारतीयों से अलग होते हैं. वही अरुणाचल प्रदेश, जिसे चीन कई सालों से अपने नक्शे के भीतर दिखाता है, लेकिन इसके बावज़ूद वह अभी तक भारत का हिस्सा इसलिए बना हुआ है क्योंकि वहां की जनता अभी भी स्वयं को भारतीय गणतंत्र का हिस्सा मानती है.

नीदो तानिया की चौथी गलती यह थी कि उसने अपने ऊपर की गयी टिप्पणी पर नाराज़ हो कर उस दूकान का शीशा तोड़ दिया. भले ही इसके लिए उसने दस हज़ार रुपयों का ज़ुर्माना भर दिया हो और अपने हत्यारों के साथ ‘समझौता’ कर लिया हो.

पांचवीं गलती उसकी यह थी कि उसने यह मान लिया था कि दिल्ली देश की राजधानी है, एक विकसित, आधुनिक, महानगर है और यहां कोई भी भारतीय बिना किसी भय के, स्वतंत्रता और वैधानिक नागरिक अधिकार के साथ रह सकता है.

हो सकता है कि उसने यह भी सोचा हो कि उसके पिता नीदो पवित्रा उसी राजनीतिक पार्टी के विधायक और परिवार तथा स्वास्थ्य कल्याण विभाग के संसदीय सचिव हैं, जिस पार्टी की सरकार अभी भी केंद्र में सत्ताधारी है.

nido1हो सकता है उसे यह भी मुगालता रहा हो कि इस देश का प्रधानमंत्री भी उसी उत्तरपूर्व की जनता द्वारा चुन कर संसद में भेजा गया है, जहां से वह खुद है. यानी असम से, जो उत्तर-पूर्व की सात बहनों में से एक है, ठीक उस नदी ‘ब्रह्मपुत्र’ की तरह, जो सात अलग-अलग नदियों के मिल जाने से एक नदी में बदल जाती है.

नीदो तानिया ने सोचा होगा कि अगर सात अलग-अलग नदियों के मेल से एक ‘ब्रह्मपुत्र’ का जन्म होता है तो अनगिनत नस्लों, धर्मों, संस्कृतियों, भाषाओं, समुदायों के मिलने से एक भारतीय गणतंत्र का भी जन्म ज़रूर हो चुका होगा. आखिर चार दिन पहले ही तो इसी दिल्ली के राजपथ पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और राजधानी के तमाम वीआईपी गणमान्यों की उपस्थिति में ‘गणतंत्र दिवस’ मनाया गया था, जिसमें भारत की विविधता की सम्मोहक झांकी प्रस्तुत की गयी थी. नीदो तानिया की हत्या के चार दिन पहले की तारीख, २६ जनवरी का यह ‘गणतंत्र दिवस’ सन १९५० में लागू होने वाले उस संविधान की स्मृति में मनाया जाता है, जो इस गणराज्य मे रहने वाले हर नागरिक को समान अधिकार और स्वतंत्रता की गारंटी देता है.

लेकिन तानिया गलत था. वह वास्तविकता से दूर था. वह किसी ऐसे सपने में जी रहा था, जिसमें हम सब, बार-बार निराश होकर भी, किसी ज़िद में जीते हैं.

नीदो तानिया की हत्या कई गंभीर सवाल खड़ा करती है. यह कोई एक आमफ़हम आपराधिक वारदात नहीं है. यह एक गणराज्य के असफल हो जाने का एक गंभीर संकेत है. एक ‘इमर्जेंसी अलार्म.’

अभी कुछ ही समय पहले अमेरिका के मशहूर अखबार ‘वाशिंगटन पोस्ट’ ने एक  सर्वेक्षण में दुनिया के उन दस सबसे मुख्य देशों में भारत को शिखर पर रखा है, जहां नस्ल, जेंडर, सामुदायिक और जातीय असहिष्णुता सबसे अधिक है. एशिया का आर्थिक ‘सुपर पावर’ बनने और चंद्रमा तथा मंगल तक अपने उपग्रह भेजने वाला, परमाणु क्लब का एक अहम सदस्य, मिसाइल टेक्नालाजी में संसार को चौंकाने वाला यह देश अपने मूल चरित्र में निहायत पिछड़ा हुआ,  पूर्व-आधुनिक, मध्यकालीन सामंती समाज का एक कट्टर हिंसक देश कैसे बनता जा रहा है? इस पर सोचने की ज़रूरत है.

क्या किसी शहर का ‘इन्फ़्रास्ट्रक्चर’ बदल कर उसे यूरोप के बड़े शहरों जैसा बना देने से, आधुनिकतम उपभोक्ता टेक्नालाजी को बाज़ार में पाट देने से, हर किसी के हाथ में स्मार्ट फोन और लैपटाप बांट देने से, सारे पापुलर साफ़्ट ड्रिंक्स और जंक-फ़ूड की दूकानें हर जगह खोल देने से, यूरोप को भी मात करने वाले बड़े-बड़े माल्स बना देने से, मेट्रो रेल और मोनो रेल चला देने, छह-आठ लेन की चौड़ी सड़कें बना देने या फिर कामन वेल्थ गेम्स तथा एशियाई खेलों के भव्य आयोजनों के बाद अब ओलिंपिक के दावे करने से कोई महानगर और उसमें बसने वाला समाज ‘आधुनिक’ हो जाता है ? क्या संविधान, संसद और विधानसभाओं की स्थापना तथा चुनाव करा देने से किसी आधुनिक और सभ्य लोकतंत्र का सचमुच निर्माण हो जाता है ? क्या आधुनिक लोकतंत्र के निर्माता बिल्डर और कार्पोरेट्स के ठेकेदार ही हुआ करते हैं ? जिन्होंने माल्स-मेट्रो और स्काई स्क्रैपर्स बनाए, वे लोकतंत्र भी बना सकते हैं? लोकतांत्रिक समाज होने के प्राथमिक और बुनियादी शर्तें क्या होती हैं ? ऐसे कई प्रश्न हैं, जो अचानक पैदा होने लगे हैं.

नीदो तानिया की हत्या के कुछ ही दिन पहले, दक्षिण दिल्ली के उसी इलाके में, बाहर घूमने निकलीं मणिपुर की  दो लड़कियों के जूते में, दो युवकों ने अपने पालतू कुत्ते का पट्टा बांध दिया था और जब डर कर वे लड़्कियां चिल्लाने लगीं तो वे हंसने लगे और जब उनमें से एक लड़की ने कुत्ते को दूर रखने के लिए उसे पैर से ठोकर मारी तो उन्होंने उस लड़की को बाल पकड़ कर घसीटा और उसे ‘चिंकी’, ‘जिंगा ला ला’, ‘चाऊमिंग’ कहते हुए गालियां दीं. उन लड़कियों की मदद में आये दो उत्तर-पूर्व के युवकों को उन्होंने मारा। शिकायत करने पर भी पुलिस ने एफ़.आइ.आर. दर्ज नहीं की.

अभी कुछ ही समय हुआ जब दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय महिला आयोग के एक संयुक्त सर्वेक्षण में यह तथ्य सामने आया है कि देश के महानगरों में उत्तर पूर्व से आने वाली ६० प्रतिशत महिलाएं नस्लवादी भेदभाव, अपमान और उत्पीड़न का शिकार बनती हैं. इन महानगरों में सबसे ऊपर है देश की राजधानी दिल्ली, जहां ८१ प्रतिशत महिलाएं इस भेदभाव और अपमान का दंश झेल रही हैं. उन्हें ‘चिंकी’, ‘नेपाली’, चीनी, ‘चाऊमिंग’ तो कहा ही जाता है, उनसे यह अक्सर पूछा जाता है कि ‘क्या तुम लोग कुत्ता और सांप खाते हो?’ इस सबका गम्भीर पक्ष यह भी है कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी भी ऐसे पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हैं। याद होगा, इस बार गणतंत्र दिवस के मुख्य  मानद अतिथि जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे थे।  यह किस्सा कम रोचक नहीं है कि मणिपुर और मिजोरम के कुछ दर्शकों से सुरक्षा तथा अन्य  सरकारी अधिकारी आकर बार बार पूछ  रहे थे कि क्या आप जापानी डेलिगेशन के सदस्य हैं ? आगरा का ताजमहल देखने के लिए टिकट खरीदने वाले उत्तर-पूर्व के लोगों से ‘पासपोर्ट’ मांगना तो एक आम घटना है। 

ज़ाहिर है, हमारी शिक्षण-संस्थाओं ने अपने देश के बारे में जो शिक्षा छात्रों को दी है, उसमें उत्तर-पूर्व के बारे में ज़रूरी जानकारी का अभाव है. खासतौर पर १९९० के बाद की नयी शिक्षा ने जिस तरह की तीन पीढ़ियों को शिक्षित किया है, वे उस देश और समाज को ही नहीं जानते, जिसमें वे रह रहे हैं।  वे व्यावसायिक कंपनियों के प्रबंधन और उसकी मार्केटिंग के लिए तो उपयोगी हो सकते हैं, वे काल सेंटर्स में काम कर सकते हैं, हाईटेक मज़दूर के रूप में विदेश जा सकते हैं और कमाई कर सकते हैं , लेकिन वे अपनी ज़मीन से कटे हुए हैं, अपने परिवार के लिए पराये और समाज के लिए अनुपयोगी हो चुके हैं।  यही वजह थी कि नीदो तानिया की ह्त्या के विरोध में आये उत्तर-पूर्व के हज़ारों छात्रों और युवाओं की एक  मांग यह भी थी  कि एन.सी.आर.टी. स्कूलों के लिए ऐसे पाठ्यक्रम तैयार करे, जिसमें इस देश की विविधता की पूरी जानकारी छात्रों को मिल सके. याद आता है , कभी रामास्वामी पेरियार ने कहा था कि ‘हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान’ वाले राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी सीमा यह है कि यह समूचे दक्षिण-भारत को भूल जाता है।  आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि आर्यसमाज के प्रणेता स्वामी दयानंद सरस्वती भी ‘आर्यावर्त’ को विंध्याचल पर्वत के ऊपर वाले  हिस्से को ही भारत मानते थे।  दक्षिण भारत उनकी ‘राष्ट्रीय’ संकल्पना में नहीं था, और उत्तर-पूर्व तो खैर हो ही नहीं सकता था।

शिक्षा के बिना किसी भी समाज या राष्ट्र-राज्य में नागरिक नहीं पैदा किये जा सकते।  लेकिन मनोवैज्ञानिक यह मानते हैं कि बच्चों का असली और सबसे पहला ‘प्राइमरी स्कूल’ उनका परिवार होता है।  सामाजिकता और नागरिकता की बुनियाद वहीं रखी जाती है। अगर हमारे परिवार नागरिक नहीं , कंपनियों के कर्मचारी पैदा करने वाले किंडरगार्डन बन गए हैं तो फिर ‘नागरिक’ कहां से आएंगे।  ऐसे में तो भीड़ ही पैदा होगी जो अपने से भिन्न किसी दूसरे को देख कर वैसा ही हिंसक व्यवहार करेगी, जैसा तानिया के साथ किया गया। 

दिल्ली अगर देश का सबसे आधुनिक और विकसित महानगर बनने  की जगह, बलात्कार, जातिवादी कट्टरता  और नस्लवादी हिंसा की राजधानी बन रहा है, तो इसके कारणों को गम्भीरता से देखना होगा। 

यह नहीं भूलना चाहिए कि ३० जनवरी १९४८ को इसी दिल्ली में महात्मा गांधी की ह्त्या एक सांप्रदायिक उन्मादी के हाथों हुई थी और अब २०१४ की ३० जनवरी को नीदो  तानिया की ह्त्या उसी समाज में पनपते नस्लवादी हिंसा के द्वारा हुई।

कुछ लोग अभी भी इसे बहुत हलके-फुल्के ढंग से, किसी मामूली वारदात की तरह देख रहे हैं।  ये उनका ‘शुतुर्मुर्गवाद’ है, जो भविष्य में आने वाले तूफ़ान से मुंह मोड़ कर, अपना सर रेत  में छुपा लेता है।

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