किसानी का एक बरस और रेणु

गिरिन्द्र नाथ महानगर दिल्ली में पत्रकारिता छोड़ बिहार के पूर्णिया जिले के अपने गाँव में अब खेती-बाड़ी कर रहे हैं. उनसे girindranath[at]gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

गिरिन्द्र नाथ
गिरिन्द्र नाथ

 

पूर्णिया और अब अररिया जिले के औराही हिंगना गांव में आज के ही दिन यानि 4 मार्च 1921 में रेणु का जन्म हुआ था। । मेरे लिए रेणु तन्मयता से किसानी करने वाले लेखक हैं, क्योंकि वे साहित्य में खेती-बाड़ी, फसल, किसानी, गांव-देहात की बातें करते हैं

किसानी करते हुए 365 दिन का आंकड़ा पूरा हुआ. खेत-खलिहानों में अब मन रमने लगा  है. अहसास ठीक वैसे ही जैसे फणीश्वर नाथ रेणु का लिखा पढ़ते हुए और अपने गुलजार का लिखा बुदबुदाते हुए महसूस करता हूं.

 
देखिए न, आज अपने रेणु का जन्मदिन भी है। वही रेणु, जिसने गाम की बोली-बानी, कथा-कहानी, गीत, चिडियों की आवाज..धान-गेंहू के खेत..इन सभी को शब्दों में पिरोकर हम सबके सामने रख दिया और हम जैसे पाठक उन शब्दों में अपनी दुनिया खोजते रह गए. रेणु का लिखा जब भी पढ़ता हूं, खुद से बातें करने लगता हूं. रेणु के बारे में जबसे कुछ ज्यादा  जानने-समझने की इच्छा प्रबल हुई, ठीक उस समय से पूर्णिया जिले की फिजा में धुले उनके किस्से इकट्ठा करने में लग गया. घाट-बाट में रेणु को ढूढ़ने लगा.
 
फणीश्वर नाथ रेणु
फणीश्वर नाथ रेणु

किसानी करने का जब फैसला लिया, तब भी रेणु ही मन में अंचल का राग सुना रहे थे और मैं उस राग में कब ढल गया, पता भी नहीं चला. गाम में रहते हुए रेणु से लगाव और भी बढ़ गया है. संथाल टोले का बलमा मांझी जब भी कुछ सुनाता है तो लगता है कि जैसे रेणु के रिपोतार्ज पलट रहा हूं. दरअसल रेणु की जड़े दूर तक गांव की जिंदगी में पैठ बनाई हुई है. ठीक आंगन के चापाकल पर जमी काई (हरे रंग की, जिस पर पैर रखते ही हम फिसल जाते हैं..) की तरह।

 
रेणु ही थे जिनका मानना था कि ग्राम समुदायों ने तथाकथित अपनी निरीहता के बावजूद विचित्र शक्तियों का उत्सर्जन किया है. वे संथाली गीतों के जरिए कई बातें कहा करते थे. उन्होंने एक संथाली गीत के जरिए कहा था – “जिदन संकु-संगेन, इमिन रेयो-लं सलय-एला” (सुख के जीवन के लिए, यहां आइए, यहां ढूंढ़ना है और पाना है..)
 
रेणु की यह पंक्ति मुझे गाम के जाल में उलझाकर रख देती है, मैं इस जाल से बाहर जाना अब नहीं चाहता, आखिर जिस सुख की खोज में हम दरबदर भाग रहे थे, उसका पता तो गाम ही है. मेरे यार-दोस्त इसे मेरा भरम मानते हैं 🙂 खैर।  
 
रेणु को पढ़कर ही डायरी और फिल्ड-नोट्स का महत्व समझ पाया. मुझे याद है सराय-सीएसडीएस के स्वतंत्र शोधार्थी के तौर पर जब टेलीफोन बूथों पर काम कर रहा था, तब सदन झा ने फिल्ड-नोट्स तैयार करते रहने की सलाह दी थी, शायद वे रेणु की बात हम तक पहुंचा रहे थे. रेणु छोटे-छोटे ब्योरों से वातावरण गढ़ने की कला जानते थे. अपने ब्योरों, या कहें फिल्ड नोट्स को वे नाटकीय तफसील देते थे. मक्का की खेती और आलू उपाजकर जब मैं की-बोर्ड पर टिपियाना शुरु करता हूं तो तब अहसास होता है कि फिल्ड नोट्स को इकट्ठा करना कितना बड़ा काम होता है.
 
गाम के मुसहर टोले में पलटनिया ऋषिदेव के घर के सामने से जब भी गुजरता हूं तो लगता है जैसे रेणु की दुनिया आंखों के सामने आ गयी है. दरअसल उनका रचना संसार हमें बेबाक बनाता है, हमें बताता है कि जीवन सरल है, सुगम है. इसमें दिखावे का स्थान नहीं के बराबर है. रेणु अपने पात्रों और परिवेश को साथ-साथ एकाकर करना जानते थे. वे कहते थे कि उनके दोस्तों ने उन्हें काफी कुछ दिया है. वे खुद लिखते हैं- 

“इन स्मृति चित्रों को प्रस्तुत करते समय अपने लगभग एक दर्जन करीबी लंगोटिया यारों की बेतरह याद आ रही है. वे किसानी करते हैं, गाड़ीवानी करते हैं, पहलवानी करते हैं, ठेकेदार है, शिक्षक है, एमएलए हैं, भूतपूर्व क्रांतिकारी और वर्तमानकालीन सर्वोदयी हैं, वकील हैं, मुहर्रिर हैं, चोर और डकैत हैं. वे सभी मेरी रचनाओं को खोज-खोज कर पढ़ते हैं- पढ़वाकर सुनते हैं और उनमें मेरे जीवन की घटनाओं की छायाएं ढूंढ़ते हैं. कभी-कभी मुझे छेड़कर कहते हैं- साले उस कहानी में वह जो लिखा है, सो वहां वाली बात है न ?” (पांडुलेख से)

 
जरा इस कविता को पढ़कर रेणु के मानस को समझने की कोशिश करिए-
“ कहा सुना सब माफ करोगे, लेकिन याद रखोगे
बचपन के सब मित्र तुम्हारे, सदा याद करते हैं
गांव को छोड़कर चले गये हो शहर, मगर अब भी तुम 
सचमुच गंवई हो, शहरी तो नहीं हुए हो..
इससे बढ़कर और भला क्या हो सकती है बात
अब भी मन में बसा हुआ है इन गांवों का प्यार…….”
 
रेणु के साहित्य में डूबे रहने की आदत से ही पता चला कि मनुष्य की आकृति, रूप-रंग, बोलचाल, उसके व्यक्तित्व की वास्त्विक कसौटी नहीं है और न हीं बड़ी-बड़ी इमारतों से देश की प्रगति मापी जा सकती है. दरअसल बहुत बार जिन्हें हम भद्दा और कुरूप समझते हैं, उनमें मनुष्यता की ऐसी चिनगारी छिपी रहती है, जो भविष्य को भी जगमग कर सके. जैसा मैला-आंचल में रेणु ने बावनदास जैसे चरित्र को पेश किया. उपन्यास में बावनदास की मौत पर रेणु की मार्मिक टिप्पणी की है- “दो आजाद देशों की, हिंदुस्तान और पाकिस्तान की ईमानदारी को, इंसानियत को बावनदास ने बस दो ही डगों में माप लिया।“

आज रेणु के जन्मदिन पर मैं बस यही सब सोच रहा हूं. उनका लिखा पढ़कर मानस बना है और अब किसानी करते हुए रेणु के पात्रों से रु-ब-रु हो रहा हूं.

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