पत्रकार मार्खेस

प्रकाश के रे बरगद के संपादक हैं.

हमारे समय की एक बड़ी त्रासदी यह है कि हमारे समाज जैसे औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक समाजों की समझ के लिए हम पश्चिमी आधुनिकता की अवधारणाओं पर आश्रित हैं. लातीनी अमेरिका के महान लेखक गैब्रिएल गार्सिया मार्खेस की मृत्यु के बाद जो श्रद्धांजलि लेख लिखे गए, उनमें बार-बार उनके ‘जादुई यथार्थ’ की चर्चा की गई. यह अवधारणा बीसवीं सदी के शुरुआती यूरोपीय समाज की विसंगतियों और विरोधाभासों की पैदाईश थी, लेकिन उनके विद्वानों ने ‘सच’ और ‘पौराणिकता’ में रचे-पगे तीसरी दुनिया के कला और साहित्य की व्याख्या करते हुए कई अन्य अवधारणाओं की तरह इस अवधारणा को भी उनपर लाद दिया. हर चीज को परिभाषित और श्रेणीबद्ध करने की यूरोपीय जिद्द ने लातीनी अमेरिका की किस्सागोई की एक परंपरा को ‘जादुई यथार्थ’ के खांचे में जड़ दिया. मेक्सिको के आलोचक लुई लील को यहाँ तक कह देना पड़ा कि अगर आप ‘जादुई यथार्थ’ की व्याख्या कर पा रहे हैं, तो यह जादुई यथार्थ नहीं है. बहरहाल, तीसरी दुनिया इस बात के लिए अभिशप्त है कि वह अपने ‘सच’ तक भी बरास्ते आधुनिक पश्चिम ही पहुँच सकता है.

गार्सिया मार्खेज भी अपने उपन्यासों की कल्पनाओं पर बरसती वैश्विक मुग्धता से अचंभित रहते थे. 1981 में दिए गए पेरिस रिव्यू के लंबे साक्षात्कार में वे कहते हैं- ‘यह बात मुझे बड़ी अजीब-सी लगती है कि मेरे लेखन की सबसे अधिक प्रशंसा कल्पना के लिए होती है, जबकि सच तो यह है कि मेरे पूरे लेखन में एक भी पंक्ति ऐसी नहीं है जो वास्तविकता पर आधारित नहीं है.’ आगे उन्होंने यह भी कह दिया कि ‘समस्या यह है कि कैरेबियाई सच्चाई अतिरेकी कल्पनाओं से मिलती-जुलती है’. खैर, सच, कल्पना और उनके विभिन्न आयामों की बहसें तो चलती रहेंगी, लेकिन ‘जादुई यथार्थ’ के इस विभ्रम का एक परिणाम यह भी हुआ कि गार्सिया मार्खेस पर स्मृति-लेख लिखते हुए लोग यह भूल गए कि उनके उपन्यासों में ‘कल्पना’ का असीम विस्तार का आधार बरसों तक बतौर पत्रकार उनके अनुभव और पर्यवेक्षण थे. उनके उपन्यास ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सोलीट्यूड’ का गाँव ‘माकोंदो’ कोई कल्पना का गाँव नहीं है. यह उनके अपने गाँव अराकटाका के पास स्थित एक पुरानी बस्ती है, जहाँ पिछली सदियों में केले के औपनिवेशिक खेत थे. इस लिहाज से मार्खेस चार्ल्स डिकेंस, मार्क ट्वेन और अर्नेस्त हेमिंग्वे जैसे साहित्यिक हस्तियों की परंपरा में हैं, जिन्होंने किस्सागोई के कलम को अखबारों के पन्नों पर धारदार बनाया.

मार्खेस के साक्षात्कारों में दो बातें बार-बार आती हैं कि वे एक उपन्यासकार से अधिक एक पत्रकार हैं, और यह कि सीधे शब्दों में कल्पना को बयान करना, जैसा सपाट चेहरे से उनकी नानी बचपन में कथाएँ सुनाती थीं जिनमें घने जंगलों में बसे आदिवासी अपने प्रेत-रूपी पुरखों के साथ होते थे और बिजली का काम करनेवाला अपने घर में पीली तितलियाँ छोड़ जाता था. इन्हीं दो बिन्दुओं के साथ गार्सिया मार्खेस के साहित्यिक व्यक्तित्व को समझा जा सकता है. ‘जादुई यथार्थ’ का मुहावरा हमें माकोंदो नहीं ले जाता. माकोंदो जाने का सूत्र गैब्रिएल गार्सिया मार्खेस के नोबेल भाषण में है. वे कहते हैं- ‘कवि और भिखारी, संगीतकार और मसीहा, योद्धा और दुष्ट, उस निरंकुश सच्चाई के सभी जीव, हम सब बस थोड़ी कल्पना के आकांक्षी हैं, क्योंकि हमारी मुख्य समस्या यह है कि हमारे जीवन को विश्वसनीय बनाने के पारम्परिक साधन हमारे पास नहीं हैं. यही, मेरे दोस्तों, हमारे एकांत का मूल है. … उन आधारों पर, जो हमारी नहीं हैं, हमारी सच्चाइयों की व्याख्या हमें और अनजाना, और कम आजाद, और अकेला बनाती है.’

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अराकटाका से ‘माकोंदो’ की यात्रा उसी कल्पना की खोज है जो नानी की कथाओं के सहारे औपनिवेशिक क्रूरताओं को बयान करने की कोशिश करती है. उनके लिए मिथक किस्सागोई का एक कारक भर नहीं है, बल्कि एक वंशावली है जहाँ छोटे-छोटे और विचित्र इतिहासों के विरसे हैं जिनके लुप्त होते जाने का खतरा हर घड़ी बना रहता है. गार्सिया मार्खेस की इस कोशिश ने उनके पत्रकारीय जीवन में आकार लिया. वे पत्रकारिता एक ऐसी ‘अतृप्त धुन’ मानते थे, जिसका ‘आत्मसातीकरण और मानवीकरण वास्तविकता से सीधे सामना करके ही किया जा सकता है.’ 1996 में इंटर अमेरिकन प्रेस एसोसिएशन की सालाना बैठक में दिया गया उनका भाषण पत्रकारिता के विद्यार्थियों और पेशेवरों के लिए एक महत्वपूर्ण पाठ है. यह विडम्बना नहीं तो और क्या है कि मार्खेस की साहित्यिक लोकप्रियता और लातीनी अमेरिका की राजनीतिक हलचल में उनके दखल का जोर ने उनकी पत्रकारिता को हाशिये पर धकेल दिया है. 

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1981 में पेरिस रिव्यू को दिये लंबे साक्षात्कार में 9 अप्रैल, 1948 को कोलंबिया के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जॉर्ज अयाला की हत्या की घटना और उसके बाद हुये हिंसक प्रदर्शनों को याद करते हुये मार्खेस ने कहा था कि  तब उन्होंने महसूस किया था कि उनकी लिखी कहानियाँ इस सच से कितनी दूर हैं. बाद में उन्हें उस कस्बे में जाना पड़ा था, जहाँ उन्होंने बचपन गुजारा था. वहां उन्हें अहसास हुआ कि यही वह जीवन है जिसे उन्होंने जिया और जाना है तथा उन्हें उसी के बारे में लिखना चाहिए.

पत्रकार के रूप में मार्खेस की पहली नौकरी तटीय शहर कार्टाजेना के एल यूनिवर्सल अखबार में थी. 1950 में वे एल हेराल्दो के साथ जुड़ गए और बर्रांक्विला चले गये. उसके बाद उन्होंने लंबे समय तक कोलंबिया की राजधानी बोगोता के एल एस्पेक्तादोर के साथ काम किया. वे प्राक-ऐतिहासिक माहौल वाले घने जंगलों और तटीय इलाकों के बारे में लिखते थे जो निरंतर आधुनिक समाज के अतिक्रमण के शिकार हो रहे थे. उन्होंने आदिवासी समाजों के बारे में लिखा, उनकी परम्पराओं और मान्यताओं के बारे में लिखा, उन्होंने सरकार के आधिकारिक प्रेस विज्ञप्तियों के झूठ को उजागर किया, उन्होंने दुर्घटनाओं और आपदाओं के शिकार अनाम-अंजान लोगों को शब्द-रूप दिया.

1954 और 1955 में मार्खेस के प्रकाशित लेखों के संग्रह एन्त्रे कचाकोस की भूमिका में जाक जिलार्द ने लिखा है कि एल एस्पेक्तादोर में उन्हें शुरू में 900 कोलंबियाई पेसो हर महीने मिलते थे जिनसे वे अच्छे से अपनी जरूरत पूरी कर सकते थे और माता-पिता की मदद भी कर सकते थे. यही वह दौर था जब उनकी पत्रकारिता और उनके साहित्य ने एक-दूसरे को समृद्ध करना शुरू किया. मार्खेस ने पेरिस रिव्यू में बताया था, ‘गल्प ने मेरी पत्रकारिता की मदद की क्योंकि इससे उसे साहित्यिक मूल्य मिला. पत्रकारिता ने मेरे गल्प की मदद की कि क्योंकि इसने मुझे वास्तविकता के बहुत निकट रखा. यह भी दिलचस्प है कि एल एस्पेक्तादोर के बोगोता कार्यालय में वे एक संवाददाता होने के साथ फिल्म समीक्षक भी थे. 1954 में मेदेलीन के भयावह भूस्खलन की त्रासदी पर लिखते हुए उन्होंने निर्बाध कल्पना का सहारा लिया और शहर तथा पीड़ितों के ऐसे शब्द चित्र खींचे जिनसे गुजरते हुए पाठक उस आपदा का हिस्सा-सा बन जाता है. इस त्रासदी में बच गए दो बच्चों अलीरियो और कारो के परिवार के बारे में उन्होंने लिखा कि उनकी माँ, मारिया कारो, मिट्टी में दफन होने से पहले कपड़े धोने जा रही थी, 9 वर्षीया उनकी बहन अंपारो फर्श बुहार रही थी, उनका आठ महीने का भाई अभी भी सो रहा था.

1955 में कोलंबिया की नौसेना के एक जहाज से आठ नौसेनिक गिर गए थे. चार दिनों की खोज के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया गया था, लेकिन दस दिन बाद उनमें से एक सैनिक लुईस वेलास्को को समुद्र से जीवित निकाला गया. इस सैनिक के साथ मार्खेस ने  20 दिनों तक हर दिन 6 घंटे अखबार के दफ्तर में बातचीत की और इस घटना पर 14 भागों में एक श्रृंखला लिखी. यह श्रृंखला वेलास्को के बयान के रूप में उसके नाम से छपी. इस रिपोर्ट ने सरकार के दावे को झुठलाते हुए यह जानकारी दी कि जहाज में प्रतिबंधित वस्तुएं थीं और सरकारी संरक्षण में उनकी तस्करी की जा रही थी. रिपोर्ट ने तत्कालीन तानाशाह और राष्ट्रपति गुस्तावो पिनिल्ला को नाराज कर दिया और इसका खामियाजा अखबार को भुगतना पड़ा. कुछ महीने बाद एल स्पेक्तादोर को बंद कर दिया गया और मार्खेस को बतौर रिपोर्टर जेनेवा, रोम और पेरिस रवाना कर दिया गया. वेलास्को की यह कथा 1970 में किताब के रूप में छपी और इस किताब में पहली बार गार्सिया मार्खेस का नाम आधिकारिक रूप से इस कहानी से जुड़ा.

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कुछ समय पश्चिमी यूरोप में रहने के बाद मार्खेस ने पूर्वी जर्मनी, मास्को और प्राग की यात्रा की. इस यात्रा का विवरण क्रोमोस पत्रिका में 1957 में प्रकाशित हुआ. उसी साल वे वेनेजुएला चले गए, जहां उन्होंने एल मोमेंतो में काम करना शुरू किया. बाद में वे वेनेजुएला ग्राफिका के सम्पादक बने. इसके दस साल बाद उनकी कालजयी कृति वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड छपी जिसके बाद उनका पूरा ध्यान उपन्यास लेखन की ओर चला गया. लेकिन, कभी-कभार पत्रकार मार्खेस भी सक्रिय हो जाता था. 1977 में उन्होंने अंगोला की क्रांति में क्यूबा की भागीदारी पर लंबा आलेख लिखा. 1996 में प्रकाशित न्यूज ऑफ ए किडनैपिंग में उन्होंने कुख्यात माफिया सरगना पाब्लो एस्कोबार के मेदेलीन गिरोह द्वारा किये जा रहे अपहरणों पर विस्तार से लिखा जो पत्रकारीय लेखन और विवरण शैली के लिहाज से अप्रतिम पुस्तक है.

मीडिया की सार्वभौम उपस्थिति से आक्रांत और सचेत पत्रकारिता की निराशाजनक अनुपस्थिति के हमारे वर्तमान में मार्खेस का लेखन और इस पेशे को लेकर उनकी समझ बड़ा सहारा हो सकते हैं. 1996 में पत्रकारों के सम्मलेन में दिए गए भाषण में उन्होंने पत्रकारों के लिए जरूरी बातों को रेखांकित किया है जिनमें ‘व्यापक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि’ का होना, अमानवीयकरण से बचना, ‘पढ़ना’ और तकनीक पर कम निर्भरता मुख्य हैं. 

(All images from http://sayedasifmahmud.com)

{दृश्यांतर के मई अंक में प्रकाशित}

3 replies to “पत्रकार मार्खेस

  1. मार्खेस पर इन दिनों हिंदी में आए लेखों में बेहतरीन! जियो प्रकाश बाबू !! हमारी उमर भी लग जाए आपको …

  2. Marquez is one of my fav writers. Prakash, you have written it very beautifully. A very nice read. Badhayian.

  3. हमारी विडम्बना है हम खुद को समझने के लिए अभी तक अपने पैमाने, मानदंड, कसौटियाँ नहीं बना पाये। शायद इसका सबसे बड़ा कारण शायद उस औपनिवेशिक शिक्षा की हिस्सेदारी रही जिसके भीतर हम खुद को किन्ही दूसरी दुनियाओं के लिए गढ़ रहे थे। हैं।

    जिस पश्चिमी आधुनिकता से हम खुद को संचालित कर ते देख रहे हैं, उसी दौर में पूंजीवादी सभ्यता की एक आलोचना महात्मा गाँधी बड़े सशक्त तरीके से करते हैं। पर आज हम उनसे बहुत दूर आकर छिटक गए हैं।

    फ़िर ऐसा ही कुछ आलोचकों ने उदय प्रकाश के कथा आख्यानों को जादुई यथार्थ कहकर सिरे से कल्पना कहने की कोशिश तो यहाँ भी की ही।

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