बिला’श’पुर

  (chandan[at]csds.in) दिल्ली स्थित सीएसडीएस के सीनियर फेलो हैं।

एक सर्जन, एक सहयोगी डाक्टर और कुछ सहायक ! बस इतने से लोगों के बूते छह घंटे में 83 महिलाओं की नसबंदी! मतलब पौने पाँच मिनट से भी कम समय में एक महिला की नसबंदी की गई! छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के एक गांव में लगे नसबंदी शिविर की यह घटना जानलेवा हड़बड़ी की अपने आप में मिसाल है। इस हड़बड़ी का नतीजा हमारे सामने है। खबरों के मुताबिक संक्रमण से अबतक बारह महिलाओं की मौत हो चुकी है और आशंका है कि कहीं महिलाओं की मृत्यु का यह भयावह सिलसिला और आगे ना बढ़े।

आखिर ऐसी हड़बड़ी किसलिए? क्या सर्जन साहब के पीछे कोई भूत लगा था, क्या उनकी कनपटी पर किसी ने बंदूक रखी थी? जाहिर है, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। तो भी, जिला अस्पताल के सर्जन साहब और उनके साथ गए सहयोगी डॉक्टर के हाथ चिकित्सीय देखभाल के तमाम मानकों को तोड़ते हुए चले तो माना जाना चाहिए कि ऐसा किसी आपातकालीन स्थिति में ही हुआ होगा। इस आपातकालीन स्थिति की व्याख्या में ही बिलासपुर के गांव के नसबंदी शिविर में हुई जानलेवा हड़बड़ी का राज छुपा है। नसबंदी शिविर में सर्जन साहब के हाथ महिलाओं की स्वास्थ्य-रक्षा को अपना कर्तव्य मानकर नहीं चल रहे थे। वे महिलाओं को ‘टारगेट’ मानकर अपना हाथ चला रहे थे। ‘टारगेट’ बुनियादी रुप में सेना का शब्द है। सेना युद्ध लड़ती है, उसे अपने टारगेट पर निशाना साधना होता है। ‘टारगेट’ को यथाशीघ्र मार गिराने में ही उसकी सफलता है। सेना के लिए शत्रु-पक्ष की ओर खड़ी कोई भी चीज चाहे वह मनुष्य हो या ह्ववाइट हाऊस सरीखा लोकतंत्र का मंदिर या फिर मशहूर नालंदा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय, सबकुछ एक ‘टारगेट’ होता है, यानि एक ऐसी चीज जो अपने विध्वंस के लिए खड़ी है।

chhattisgarhसेना का यह शब्द-विशेष और उससे जुड़ी आक्रामकता का भाव आज के हमारे विकासपरक लोकतंत्र में भी चला आया है। बाजार अपने विस्तार में आक्रामक है, कंपनियां अपना सामान बेचने और उसके अनुकूल जनसंचार  माध्यमों पर छवि रचने के मामले में आक्रामक हैं और राज्यसत्ता मानव-विकास का अपना टारगेट पूरा करने के मामले में आक्रामक है। बिलासपुर का नसबंदी शिविर सरकारी परिवार नियोजन कार्यक्रम का टारगेट पूरा  करने के लिए लगाया गया था। ऐसे शिविर किसी वित्तवर्ष के अक्तूबर से फरवरी माह तक हर साल लगाये जाते हैं। सर्जन साहब को जिला स्तर पर दिया गया सरकारी टारगेट पूरा करना था। उनका जिला राज्य में  मानव-विकास सूचकांक की सीढ़ी पर बाकी जिलों से ऊँचा दिखे और ऐसे जिलों के बूते छत्तीसगढ़ राज्य मानव-विकास के सूचकांक की सीढ़ी पर बाकी राज्यों की अपेक्षा तेजी से ऊपर चढ़ता साबित किया जा सके – सर्जन साहब की हड़बड़ी का स्रोत इस सोच में छुपा है। इस सोच के मूल में है विकासमूलक इतिहास-धारा का यह सिद्धांत कि हर विकासशील देश को मानव-विकास के सूचकांक की सीढ़ी चढ़कर ही ‘विकसित’ यानि मनुष्यता के  अंतिम लक्ष्य तक पहुंचना है। सोच सेना सरीखी हो, मगर सोच को पूरा करने के लिए संसाधनों का अभाव हो तो फिर मानवीय-विकास का राजकीय कर्म मनुष्यता से द्रोह का उपक्रम बनकर रह जाता है। छत्तीसगढ़ की  घटना इसी बात की मिसाल है। जरा सोचें कि यह दुर्घटना मात्र डाक्टरों की लापरवाही की वजह से हुई जैसा कि छत्तीसगढ़ की सरकार कहती है या इस लापरवाही का रिश्ता ग्रामीण स्वास्थ्य-ढांचे में व्याप्त अभाव से है ?

सरकारी स्वास्थ्य ढांचे से संबंधित आधिकारिक आंकड़े कहते हैं कि बिलासपुर जिले की घटना अपने को दोहराते रहने के लिए बाध्य है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट रुरल हैल्थ स्टैटिक्स इन इंडिया 2012 के अनुसार  देश के 636000 गांवों में रहने वाले 70 करोड़ आबादी के लिए, कुल 1,48,366 स्वास्थ्य उपकेंद्र , 24,049  प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 4,833 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। रिपोर्ट कहती है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 74.9 प्रतिशत सर्जन, 65.1 प्रतिशत प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ,  79.6 प्रतिशत फिजिशियन तथा 79.8 प्रतिशत बाल-रोग विशेषज्ञों की कमी है।स्वास्थ्य मंत्रालय की परिभाषा के अनुसार एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को पहाड़ी तथा जनजातीय इलाकों में 80 हजार आबादी तथा मैदानी इलाकों में 1 लाख 20 हजार आबादी की स्वास्थ्य संबंधी विशिष्ट जरुरतों को पूरा करना होता है। इस मानक के हिसाब से छत्तीसगढ़ में  194 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र होने चाहिए लेकिन वहां पर ऐसे केंद्र अभी 148 ही हैं। सोचा यह भी जाना चाहिए कि एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के बूते क्या 80 हजार से लेकर 1 लाख 20 हजार तक की आबादी की स्वास्थ्य संबंधी विशिष्ट जरुरतों को पूरा करने का ख्याल व्यवहारिक है?

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रेफरल होते हैं और बीमार की स्थिति की गंभीरता के लिहाज से उनका नंबर बाद में आता है। ग्रामीणों के लिए प्रशिक्षित डाक्टर से स्वास्थ्य-सेवा हासिल करने का शुरुआती बिन्दु प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है। रिपोर्ट के अनुसार देश के ग्रामीण इलाकों में पाँच सालों (2005-2012) के भीतर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या में महज 813 केंद्रों की बढ़ोत्तरी हुई है। याद रहे कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट में ऊँट  के मुंह में जीरा के समान प्रतीत होती इस बढोत्तरी को प्रतिशत पैमाने पर यों दिखाया गया है मानों यह अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है। इस ढांचे के भीतर भी डाक्टरों तथा अन्य चिकित्साकर्मियों की संख्या वांछित तादाद से 10.3 प्रतिशत कम है। एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को पहाड़ी और जनजातीय इलाके में 20 हजार तथा मैदानी इलाके में 30 हजार आबादी को स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने का जिम्मा दिया गया है। लेकिन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या में कमी की वजह से बिहार में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को फिलहाल औसतन 49,423 लोगों, झारखंड में 75,870 और छत्तीसगढ़ में 26,456 लोगों की स्वास्थ्य संबंधी प्राथमिक जरुरतों को पूरा करना पड़ रहा है। और, रिपोर्ट के अनुसार छतीसगढ़ में मौजूदा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या भी वांछित संख्या से कम है।

ग्रामीण चिकित्सा-ढांचे का यह अभाव मानव-द्रोह का लक्षण है। अचरज कीजिए कि विकासमूलक लफ्फाजियों से चल रही हमारी सरकार के वित्तमंत्री को अपने बजट भाषण में लगता है कि दिल्ली के एम्स सरीखे चंद  संस्थान और बनवा दिए जायें स्वास्थ्य-सेवा के मामले में हर नागरिक के लिए रामराज्य आ जाएगा।बजट भाषण में वित्तमंत्री ने सरकारी स्वास्थ्य नीति के बारे में मात्र इतना कहा कि सरकार हर नागरिक को बुनियादी  स्वास्थ्य सुविधा पूरा करने के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए मुफ्त दवा और जांच की सुविधा मुहैया कराएगी। यह होगा कैसे ? क्या उन 500 करोड़ रुपये से जिसे देने का वादा बजट भाषण में किया गया ताकि एम्स सरीखे  चंद संस्थान और बनवाये जा सकें। चंद विश्वस्तरीय सुविधा वाले चिकित्सा संस्थान बनाकर देश की 70 करोड़ आबादी की स्वास्थ्य सेवा संबंधी जरुरतों को पूरा नहीं किया जा सकता। जब तक हमारे नीति-नियंता यह नहीं  समझेंगे कि देश की 31 प्रतिशत ग्रामीण आबादी को 30 किलोमीटर की यात्रा करने के बाद ही किसी चिकित्सा-केंद्र के दर्शन होते हैं, तबतक छत्तीसगढ़ के बिलासपुर की घटना अपने को अलग-अलग रुपों में दोहराते रहेगी!

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