जिंदगी की जुस्तजू में प्रेम का दीप ‘कोशिश’

सैयद एस तौहीद फिल्मों के शौकीन हैं. इनसे passion4pearl@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.
 
मूक-बधिर और ऐसे अन्य लोगों की कहानियां सिनेमा में अति नाटकीयता, दुखड़े के साथ गैर-जरूरी राग-विलाप समेटे हुए रहती है. आपने इन्हीं कुछ फिल्मों के आधार पर मत विकसित कर लिया होगा. लेकिन ठहरिए, शायद आपने सरल, स्वाभाविक, प्रभावी एवं संतुलित गुलजार की ‘कोशिश’ नहीं देखी. इस किस्म की सादी, सच्ची, नेकदिली वाली फिल्में रोज-रोज देखने को नहीं मिलतीं. हरि व आरती की स्नेहमय कथा मन पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ जाने में सक्षम थी. कोशिश का प्रभाव सरल, सहज एवं सच्ची कहानियों में भरोसा जगाता है. फिल्मकार ने इसे दुखगाथा बनने नहीं दिया, एक आशावान संघर्षगाथा बनाया. कोशिश दया के पात्र किरदारों से आगे की कहानी थी. गुलजार ने दिखाया कि जटिल मानवीय संवेदनाएं ली हुई फिल्में भी खूबसूरत बनायी जा सकती हैं.

koshish 2संदेशवाहक मूक-बधिर हरिचरण माथुर (संजीव कुमार ) बोलने-सुनने से मजबूर, लेकिन मेहनतकश शख्स था. हरि अपने जैसी आरती (जया भादुड़ी) से स्नेह के धागों में बंध जाता है. हरि उसमें अपना जीवन साथी देख रहा था शायद. वो आरती को मूक-बधिरों के विद्यालय में जाने को उत्साहित करता है. यहां वह अपने समुदाय से संकेत भाषा में बातचीत करने की कला सीख लेगी. हरि-आरती का अलबेला प्यार विवाह की मंजिल को पाता है. बरसों बाद जीवन भर का यह साथ आरती के गुजर जाने से खालीपन का शिकार हुआ, तो हरि ने बड़ी हिम्मत से पुत्र अमित को एक मेहनती एवं आत्मनिर्भर शख्स बनाया. हरि यह उम्मीद लगाये था कि इस कठिन परवरिश से प्रेरणा लेकर अमित किसी भी मूक-बधिर साथी का अनादर नहीं करेगा, लेकिन अपने जीवन साथी को लेकर स्पष्ट था कि वो शरीर के किसी भी मजबूर (आंख कान जबान से मजबूर) लड़की को नहीं अपनाना चाहता. एक सामान्य व्यक्ति होने के नजरिए से अमित की सोच एक हद तक ठीक थी. किंतु मां-बाप और लड़की के नजरिए से दिल दुखाने वाली बात थी. कथाक्रम में थोडे से स्टीरियोटाइप को तोड़ कर निर्देशक फिल्म की रूह से इंसाफ कर गए. दो असामान्य लोगों की यह प्रेमकथा हमारी समझ से आगे जाकर विकसित होती है. कथाक्रम का फ्लो यह रेखांकित कर गया कि जीवन आस्था एवं आशाओं का दूसरा नाम है.

गुलजार जिस खूबसूरती से हरेक फ्रेम, किरदार को गढ़ते चले, वह कमाल के नतीजे दे गया. अनावश्यक किरदार कथा की रूह को स्थान से भटका दिया करते हैं, कोशिश में कोई भी किरदार बस यूं ही नहीं आया. आप उस नाबीना शख्स (ओम शिवपूरी ) को याद करें, एकबारगी में बस न जाने क्यों के दायरे में नजर आयेंगे, लेकिन कहानी के साथ यह नाबीना आदमी हरि-आरती की जिंदगी में धुरी से उभर कर आता है. एक शाम दोनों को यह शख्स समंदर के पास नजर आया. जब ओम शिवपुरी को मालूम चला कि दोनों सुन -बोल नहीं सकते. यह कैसे हमजुबान मिलाएं तुमने भगवान, तुम दोनों न तो कुछ सुन सकते हो, न कह सकते हो. और मैं देख नहीं सकता. ठीक है बेटा, जब बिना आंखों के, बिना बोली के इतनी पहचान करा दी है भगवान ने, तो आगे भी निभा ही देगा. जब दिल पहचानते हों, तो उन्हें बोलने या सुनने की जरूरत नहीं पड़ती. प्यार अंधा होता है, यह तो सुना था. लेकिन गूंगा -बहरा होता, तब भी प्यार ही होता. कोशिश का सार यहीं कहीं था.sanjeev-kumar-jaya-bachan-in-koshish

इतनी सारी खूबसूरती समेटे इस फिल्म में मामूली सी खामी असरानी (कानू) के किरदार से जुड़ी है. कानू की कथा का पूरा हिस्सा मुख्य कहानी के समानांतर होकर भी उससे कोई खास ताल्लुक जोड़ नहीं सका. सिर्फ सरसरी तौर पर प्रासंगिक नजर आया. कहानी के अतिरिक्त हिस्से की तरह असरानी बेवजह से मालूम पड़ते हैं. लेकिन कानू के बेईमान, दुष्ट किरदार में कुछ लोग हरि के मेहनतकश जज्बे का अनुभव तलाश सकते हैं. मेहनती हरि के बरक्स कानू जिंदगी को शॉर्ट कट में जी रहा था. यह दो लोग समानांतर किंतु मुक्त्तलिफ राहों का बेहतरीन संघर्ष नजर आते हैं. क्या आपने असरानी को इस किस्म के किरदार में पहले कभी देखा था? कॉमिक किरदारों के विशेषज्ञ असरानी में कानू की संभावनाएं तलाश लेना गुलजार ही कर सकते थे. तमाशबीन जहान में हरि-आरती की जीवनकथा बहुत प्रेरक दिखाई देती है. कोशिश दो मजबूर, किंतु आशा एवं विश्वास लेकर संघर्षरत लोगों की अनुभवयात्रा को बयान कर गयी. हरि-आरती के प्रेमकोण को फिल्मकार ने बड़ी कुशलता से मिलन-विरह की गाथा का भाव दे डाला. एक यात्रा जिसमें हम अनुभव कर सके कि जिंदगी का एक पहलू यह भी है.

संजीव कुमार के बारे बहुत कुछ कहा गया,बहुत लिखा गया हो, लेकिन जब कभी इस महान शख्स की बात निकलेगी हमेशा बहुत कुछ बाकी रह जाएगा. संजीव हिन्दी सिनेमा में सुनहरे पाठ की तरह अवतरित हुए. वे सिनेमा की एक अपूर्व शख्सियत थे. जीवन के प्रति हरि का जीवट देखने लायक था. जुबान की भी एक सीमा हुआ करती होगी, लेकिन हरि के आव-भाव, आंखे और शरीर शब्द के मोहताज नहीं थे. अभिव्यक्ति में शब्द से बढ़कर भी उजाले हैं. संजीव इस किस्म के दृश्यों में सहज हैं. पहले पहल आरती द्वारा ठुकरा दिए जाने बाद हरि की प्रतिक्रया पेशे-काबिल है. राहगीर हरि की दुनिया का मखौल उड़ा रहे थे, उसकी मजबूरी पर ठहाका लगा रहे थे. लेकिन जिस प्रतिकार से हरि ने उनका जवाब दिया, शर्म से आंखे झुकाने को मज़बूर थे. पिता का मान अनदेखा करने पर अमित के सामने एक बाप की प्रतिक्रया में भी संजीव का अभिनय रेंज देखने लायक था. वहीं दूसरी तरफ जया भादुड़ी ने भी आरती के सादे किरदार को बारीकी से निभाया और संजीव के हरि का सुंदर साथ दिया. संजीव कुमार के बिना आप ‘कोशिश’ की कल्पना नहीं कर सकते. गुलजार ने उनके हुनर का शायद सबसे उम्दा इस्तेमाल किया, कोशिश यह साबित करती नजर आती है. फिल्म के अनेक दृश्यों का प्रभाव उन्हीं की वजह से था. संजीव-गुलजार की जोड़ी हिन्दी सिनेमा की शायद सबसे बेहतरीन फिल्मकार-अभिनेता जोड़ी थी. इन दोनों ने जिस किस्म के विषय चुने, जो जोखिम उठाये, वह अतुलनीय है. अंगूर, कोशिश, नमकीन, आंधी जैसी फिल्में क्या नहीं कहती!

सक्रिय समाज के बीच हरि-आरती जैसे लोग अजनबी महसूस करते होंगे. हरि समान लोगों के लिए सामान्य जिंदगी गुजर करना बड़ा मुश्किल है. कोशिश अपनी राह में उन सभी चुनौतियों का डटकर सामना करती नजर आती है. संजय लीला भंसाली की ‘खामोशी’ के लिए रेफेरेन्स प्वाइंट यही फिल्म रही होगी. कोशिश का उद्देश्य अक्षम लोगों की दिक्कतों को दिखाना-भर नहीं था, बल्कि हरि -आरती के उदाहरण के जरिए हिम्मत-हौसले व प्रेम की विजय को दिखाना था.

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